प्रविष्टि 52 - Page 197

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अति दुःख है कि मैं उनके सुझाव को स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि वह प्रविष्टि 52 को इस प्रकार से और ऐसी मात्रा में बढ़ाना चाहते हैं कि उसमें देश की हर अदालत का आकार समाविष्ट हो जाए। यह एक असंभव प्रतिपादन है और मुझे खेद है कि मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता।

अब मैं अपने मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद के तर्कों पर आता हूँ। सर्वप्रथम, उन्होंने कहा कि इस प्रविष्टि 52 में, हम उच्च न्यायालय को लाने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि यह प्रविष्टि जैसी पहले थी उसमें वे स्थान नहीं पा सके थे। सदन को याद होगा कि प्रारूपण समिति समय-समय पर मात्र प्रविष्टि को ही नहीं अपितु अनुच्छेदों को भी सुधारती रही है। मैं प्रारूपण समिति की ओर से सर्वज्ञान का दावा नहीं कर रहा हूँ। यदि प्रारूपण समिति संपूर्ण वस्तु को एक ग्रास में निगलने में असफल हुई है तो मैं न तो प्रारूपण समिति पर आक्षेप लगाने के लिए तैयार हूँ न किसी को फैसलना बदलने देने और न प्रारूपण समिति पर कलंक लगाने देने के लिए तैयार हूँ। यह बहुत बड़ा काम है और हम अपने रास्ते पर धीरे चलने के लिए बाध्य हें।

श्री एच.वी. कामथ : क्या सदन प्रारूपण समिति के फैसले को नहीं बदल सकता?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : लेकिन सदन को वह मानना चाहिए जो मैं

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कह रहा हूँ अर्थात् यह कि प्रारूपण समिति के लिए सदन के समक्ष स्पष्ट और पूर्ण सिद्धांत लाना संभव नहीं है जिस पर दुबारा विचार करने की आवश्यकता न हो। अब श्रीमन, मेरे मित्र ने कहा कि हम उच्च न्यायालयों को भी शामिल कर रहे हैं। अच्छा, हम उच्च न्यायालय को साशय लाये गये क्योंकि हमने महसूस किया था कि कुछ अनुच्छेदों के विचार से जिन्हें हम पहले ही पारित कर चुके हैं, उच्च न्यायालयों को शामिल करना आवश्यक है। मेरे मित्र श्री नजीरूद्दीन अहमद प्रकटतः अनुच्छेद 192क, 193, 197, 201 तथा 207 को भूल गऐ जो उच्च न्यायालयों के बारे में हैं यदि यह इन अनुच्देदों में अपना दिमाग लगाएंगे तो पायेंगे कि प्रांतीय विधानमंडलों के लिए मात्र छोड़ा गया विषय केवल धन संबंधी अथवा विषय सामग्री संबंधी अधिकारिता नियत करना है। शेष उच्च न्यायालय को केंद्र के क्षेत्राधिकार में रखा गया। स्पष्टतः जब संघ सूची की प्रविष्टियों पर विचार कर रहे जिनका अर्थ केंद्र को संपूर्ण शक्तियां देना है यह कमी छोड़ने और उच्च न्यायालयों को जो, जैसा मैंने कहा था, इन अनुच्छेदों के कारण केवल दो विषयों को छोड़ने के लिए बाध्य थे जो पूर्णतः संसद के क्षेत्राधिकार में रखे गए हैं। इसके बारे में कुछ भी पाखण्ड नहीं है। यह मात्र सुधार करना है और गलतियां इस कारण से हुईं कि अनुच्छेद और प्रविष्टि ठीक से नहीं बने थे। यही कारण है जिसकी वजह से उच्च न्यायालय इसमें शामिल किए गए हैं।