178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपने यहाँ हाजिर होने से रोक देगा। मैं समझता हूँ कि यह मान लिया जाएगा कि यह एक बड़ी कठिनाई है। इसलिए विभिन्न उच्च न्यायालयों में वकालत करने वाले व्यक्तियों के संबंध में एक सी स्थिति रखने के लिए यह प्रविष्टि जो प्रस्ताव करती है वह वृत्तियों विषयक प्रविष्टि 17 से निकालना है और उसे यहाँ रखना है जिससे कि उच्च न्यायालय में हाजिर होने वाले व्यक्तियों के विधि व्यवसाय को एकरूप कानून से विनियमित किया जा सके। प्रविष्टि 52 में कुछ भी क्रांतिकारी नहीं है और कुछ भी प्रच्छन्न नहीं है, जैसा कि प्रारूपण समिति ने प्रस्ताव किया है।
सभापति : अब मैं संशोधनों को मतदान के लिए प्रस्तुत करता हूँ।
(जैसा कि पहले दिया है डॉ. अम्बेडकर के संशोधन को छोड़कर सभी संशोधन अस्वीकार कर दिए गए।)
(प्रविष्टि 52 संशोधित रूप में संघ सूची में जोड़ी गई। )
| vE | csMd |
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| ke | kU; |
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प्रविष्ट 53
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बम्बई : सामान्य) : श्रीमन, मेरा प्रस्ताव है :
“कि सूची I की प्रविष्टि 53 में प्रथम अनुसूची के भाग III में तत्समय विनिर्दिष्ट रियासतों के सिवाय शब्दों और अंकों को विलुप्त किया जाए।
यह इसलिए है क्योंकि हम भाग I और भाग III के बीच कोई अंतर करना नहीं चाहते। श्री एच.वी. कामथ (मध्य प्रांत और बरार) : मेरा थोड़ा सा संशोधन संख्या 198
है। श्रीमन, मेरा प्रस्ताव है :
“कि प्रथम सूची के (छठा सप्ताह) के संशोधन संख्या 25 के संदर्भ में सूची I की संख्या 53 में और ऐसे किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन शब्दों के स्थान पर और के किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन शब्द रखे जाएँ।
यह शब्दों का अंतःस्थापन मात्र है। मैं जानता हूँ, लेकिन यह थोड़ा-सा अर्थ बदल देता है और प्रविष्टि के आशय को उजागर करता है। मैं विश्वास करता हूँ कि यह प्रविष्टि किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता कुछ क्षेत्रों के अपवर्जन से संबंध रखती है।
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 31 अगस्त, 1949, पृ. 783-84