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माननीय श्री बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, श्री कामथ का संशोधन बिल्कुल अनावश्यक है क्योंकि मेरे संशोधन का उद्देश्य प्रविष्टि 53 के उस भाग को शुरू से सिवाय तक पूर्णतः निकाल देना है। यदि मैं प्रविष्टि के किसी भाग को रखता हूँ तो प्रश्न पैदा हो सकता है कि प्रविष्टि में अप्रयुक्त पदावली श्री कामथ द्वारा सुझाये शब्दों से अच्छी है अथवा इसका उलटा सही है।
श्री एच.वी. कामथ : मेरा संशोधन प्रविष्टि के ही बारे में है न कि संशोधन के।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं सोचता हूँ ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि मैं पूरी चीज को छोड़ रहा हूँ। दूसरा बिंदु यह है कि प्रविष्टि 53 में प्रयुक्त भाषा अनुच्छेद 207 में भाषा के अनुरूप रखनी होगी।
श्री एच.वी. कामथ : यदि यह बात मानी ली गई तो दूसरे अनच्छेद की जो पहले ही पारित हो चुका है। भाषा में संशोधन किए जाएंगे - तीसरे वाचन में।
माननीय सभापति : मुझे मालुम होता है कि डॉ. अम्बेडकर का संशोधन इस प्रवेश के एक भाग का संदर्भ करता है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं अंतिम भाग को बाहर निकाल रहा हूँ। पष्थक अनुसूची के भाग III में तत्समय विनिर्दिष्ट रियासतों के सिवाय संशोधित रूप में स्थिर रहेगी। यह प्रविष्टि इस प्रकार होगी - उस राज्य के बाहर किसी क्षेत्र में भारत के राज्यक्षेत्र के अंदर किसी राज्य में मुख्य पीठ रखने वाले अधिकारिता का विस्तार और ऐसे किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन।“ यह प्रविष्टि केवल अधिकारिता के या अपवर्जन का उपबंध विस्तार करती है।
श्री एच.वी. कामथ : मेरा संशोधन भाग दो के संदर्भ में है।
“उस राज्य के बाहर किसी क्षेत्र से ऐसे किसी उच्च न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन।“
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं आपके वाक्छल को स्वीकार नहीं कर रहा हूँ।
श्री एच.वी. कामथ : यह वाक्छल नहीं है। यह सही अंगरेजी का सवाल है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यदि यह मामला मात्र अंगरेजी का है तो हम इसे अगले चरण पर ले सकते हैं।
माननीय सभापति : तब मैं श्री कामथ के संशोधन को मत के लिए प्रस्तुत करता हूँ।
(संशोधन अस्वीकार किया गया।)