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है। मुझे दो विषयों को मिलाना अत्यंत आवश्यक प्रतीत होता है। केंद्र से राज्यों को अनुदान का प्रश्न दो पृथक अनुच्छेदों 255 और 262 में विचारणीय इस शर्त पर रहा है कि सहायता के लिए केंद्र द्वारा राज्य को अनुदान दिया गया है। संघ या राज्य ’ऐसी धनराशि, जिसकी व्यवस्था संसद कानून के द्वारा करे। हर वर्ष भारत की संचित निधि पर प्रत्येक वर्ष अनुदान के रूप में ऐसे राज्यों की संचित निधि पर जो संसद द्वारा कानून द्वारा सहायता के जरूरतमंद निश्चित किए जाएं भारित होंगी।
इसलिए वित्तीय सहायता के द्वारा राज्य की सहायता का उपबंध पहले से ही अनुच्छेद 255 में है। मैं सदन के सदस्यों का ध्यान अन्य महत्वपूर्ण अनुच्छेद की ओर आकर्षित करना चाहूँगा जो अनुच्छेद 262 है जो व्याप्ति में बहुत बड़ा है : वह कहता हैः ’संघ या राज्य इस बात के होते हुए भी कि प्रयोजन वह नहीं है जिसकी बावत यथास्थिति संसद या मंत्रिमंडल जैसा भी मामला हो कानून विधियां बना सकेगा, किसी भी लोक प्रयोजन के लिए अनुदान कर सकेगा।
जैसा सदन देखेगा, इसकी सीमा बड़ी है। यह कहता है कि यद्यपि सूची I में विषय नहीं होना चाहिए। अनुदान देने के लिए संसद स्वतंत्र हो जाएगी। इसलिए यह प्रश्न पृथक से विचारणीय होते हुए भी, मैं प्रविष्टि 57क से मिलाने की कोई आवश्यकता नहीं समझता।
प्रविष्टि 57क संस्थाओं के कुछ वर्गों के स्तर को मात्र बनाये रखने का विचार करती है जैसे उच्च शिक्षा देने वाली संस्थाएं, वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थाएं, अन्वेषण की संस्थाएं इत्यादि। आप पूछ सकते हैं, यह प्रविष्टि क्यों है? मैं बताऊंगा, यह आवश्यक क्यों है? उदाहरण के लिए बी.ए. डिग्री की परीक्षा लीजिए जो भारत में विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा ली जाती है। अब, बहुत से प्रदेश व केंद्र, जब उम्मीदवारों के लिए विज्ञापन करते हैं, मात्र कहते हैं कि उम्मीदवार किसी विश्वविद्यालय का स्नातक हो। अब, मान लीजिए मद्रास विश्वविद्यालय कहता है कि एक उम्मीदवार को बी.ए. की परीक्षा में यदि कुल अंकों के 15 प्रतिशत अंक प्राप्त करता है उस परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए विचारणीय समझा जाएगा; और मान लो बिहार विश्वविद्यालय कहता है कि एक उम्मीदवार जिसने 20 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं बी.ए. डिग्री परीक्षा को उत्तीर्ण करने योग्य समझा जाएगा; और कुछ अन्य विश्वविद्यालय कोई दूसरा स्तर निश्चित करते हैं, तब यह पूर्णतः अस्त-व्यस्त दशा हो जाएगी और अभिव्यक्ति जो साधारणतः प्रयोग होती है कि उम्मीदवार स्नातक होना चाहिए, मैं समझता हूँ, निरर्थक हो जाएगा। इसी प्रकार, यहाँ कुछ अन्वेषण संस्थाएं भी हैं, जिनके परिणामों पर केंद्र और राज्यों के बहुत से कार्यकलाप आधारित होते हैं, स्पष्टतः आप इन तकनीकी और वैज्ञानिक संस्थाओं के परिणामों को साधारण स्तर से गिरने की आज्ञा नहीं दे सकेंगे और तो भी उन्हें केंद्र के उद्देश्यों अथवा अखिल भारतीय उद्देश्य