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कर रहे हैं कि क्या प्रविष्टि विशेष सूची I में रहेगी अथवा सूची I में एक भाग और सूची II अथवा सूची III में।
सदन को उस पर वाद-विवाद करने की संपूर्ण स्वतंत्रता होगी और कोई यह सुझाव देने नहीं जा रहा है कि अनुच्छेद 13 के कारण सदन के हाथ बंधे हुए हैं और वह अखबारों पर किसी प्रकार की पाबंदियां लगाने के लिए कुछ नहीं कर सकते। मैं इस वाद-विवाद को पूर्णतः अस्वीकार करता हूँ।
श्रीमन, अब मैं बहुत से संशोधनों पर आना चाहूँगा। यदि आप मुझे आज्ञा देंगे तो मैं उन पर चर्चा करना चाहूँगा, क्योंकि जो मेरा अनुकरण करेंगे वे मेरा उसी का अनुकरण करंगे जो कुछ मैं कह रहा हूँ। मुझे यह दिखाई देता है कि जो मित्र समाचार प़त्रों में रुचि रखते हैं वे वास्तव में पूर्ण मुक्ति के लिए प्रयत्न कर रहे हैं, मानो कर लगाने की किसी किस्म से जो प्रदेश द्वारा लगाये जाने चाहिए। मेरे मित्र गोयनका तथा अन्य बहुतों द्वारा रखा गया पहला संशोधन यहाँ पचास अथवा साठ नाम हैं - यह है कि इसे संघ सूची में अंतरित कर दिया जाए। यह करने के लिए उन्होंने कुछ किया है जो हम लोगों ने नहीं किया है। हमारी अखबारों की प्रविष्टि कर लगाने से संबंधित नहीं है। वे सदस्य जिन्होंने सूची I और सूची II में नजदीक से प्रबंध की देखरेख नहीं की है यह महसूस करेंगे कि हमने प्रविष्टियों को दो भागों में अलग-अलग किया है, वे प्रविष्टियाँ जो पूर्णतः विधायी हैं और वे प्रविष्टियां जो कर योग्य हैं। आपको स्मरण होगा कि समाचार पत्र, यद्यपि वे सूची III में वर्णित हैं। केवल विधायी प्रविष्टियों में वर्णित है। अब, मेरे मित्र गोयनका द्वारा पेश किए गए संशोधन ने अपने विचार से सबसे घटिया काम किया है अर्थात् उसने समाचार पत्रों को सूची I के उस भाग में रखा जो कर लगाने के विषय में है। इसका तात्पर्य कि अब केंद्र समाचार पत्रों पर कर लगाने के लिए स्वतंत्र होगा। (सुनिए, सुनिए) मैं समाचार पत्रों को पसंद नहीं करता और मैं उनको दुःखी करने अथवा बचाने में रुचि नहीं ले रहा संपूर्ण मामला मैं सदन के हाथों में सौंपने के लिए तैयार हूँ जो वह चाहे करें।
मेरे मित्र झुंझुनवाला द्वारा पेश किया गया प्रस्ताव क्या है? वह सोचते हैं कि यद्यपि समाचार पत्र सूची I में अंतरित हो जाने चाहिए फिर भी समाचार पत्र माल की भांति बेचने के लिए है, अब भी सूची II में रहेंगे, क्योंकि उस सूची में प्रविष्टि बहुत बड़ी प्रविष्टि है और समचार पत्रों को माल की भांति अपने में समेट लेगी। इसलिए वह महसूस करते हैं कि श्री गोयनका का संशोधन स्वीकार करने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता क्योंकि प्रांतों द्वारा उस प्रविष्टि के अधीन कर लगेंगे जैसे माल की बिक्री से संबंधित प्रविष्टि के अधीन। इसलिए उन्होंने अपना संशोधन समाचार पत्रों को ’बिक्री कर अधिनियम’ से बाहर रखने के लिए किया है।