प्रविष्टि 88 क - Page 232

211

(इस स्तर पर श्री देशबंधु गुप्त बोलने के लिए उठे।)

माननीय सभापति : मैं नहीं समझता कि इस प्रकार की स्थिति में किसी प्रकार के उत्तर का अधिकार है।

श्री देशबंधु गुप्त : व्यवस्था के प्रश्न पर मैं एक या दो बात स्पष्ट करना चाहता हूँ जिनसे मालुम होता है भ्रांति पैदा हुई है।

माननीय सभापति : नहीं, प्रश्न है कि आपको उत्तर देने का अधिकार है अथवा नहीं।

एक माननीय सदस्य : सभापति जी पहले ही कह चुके हैं कि आदरणीय सदस्य को उत्तर देने का अधिकार नहीं है।

श्री देशबंधु गुप्ता : श्रीमन, चूंकि कुछ मुद्दे उठाए गए हैं। इसलिए मैं उन पर बयान देने के लिए निवेदन करता हूँ, खासतौर पर इसलिए कि इस ओर से कोई वक्ता श्री अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर के मुद्दा उठाने के पश्चात् नहीं बोला है।

माननीय सभापति : मैं सोचता हूँ, आपकी ओर से बड़ी संख्या में व्यक्ति बोलें हैं और आपकी विचारधारा को लेकर।

मैंने व्यवस्था के प्रश्न को समझ लिया है जो उठाया गया है। मैं इन पर विचार करूंगा और बाद में अपना निर्णय बताऊंगा लेकिन इस समय मैं डॉ. अम्बेडकर से दूसरे मुद्दों पर विचार करने के लिए कहूँगा जिनको स्वयं उन्होंने उठाया है। यह मानकर कि मैं व्यवस्था देता हूँ कि यह क्रमानुसार है तभी मैं उनसे योग्यता के आधार पर उत्तर देने के लिए तैयार होने की आशा करूंगा कि क्या आप इसे इस सूरत में रखना पसंद करेंगे जिसमें श्री गोयनका ने पेश किया है अथवा श्री झुंनझुंनवाला से संशोधन कराना चाहेंगे।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : ऐसी दशा में वह संशोधन वापिस लेंगे।

vE csMd j

श्री देशबंधु गुप्ता : संशोधन पेश नहीं किया गया है। इसे पेश करने के लिए मैं अपवाद चाहता हूँ।

माननीय सभापति : मैं अपना निर्णय बाद में दूँगा। अब हम दूसरे विषय लेंगे। कुछ नये अनुच्छेद प्रस्तावित हुए हैं। कुछ छपी सूची में है उन पर जाने से पूर्व आइए दूसरी प्रविष्टियों पर आएँ।

* * * *