प्रविष्टि 91 - Page 234

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के कार्य के आरंभ से यह जानने के लिए इच्छुक थे कि केन्द्र की विधायी शक्तियां क्या हैं? वे खासतौर से व श्रेणीवार ढंग से यह जानना चाहते थे; यह कहकर संतुष्ट नहीं हो रहे थे कि केन्द्र को केवल अवशिष्ट शक्तियाँ प्राप्त होगी।

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प्रदेशों और देशी रियासतों से भयभीत होकर हमें विशेष रूप से यह बताना था कि चिह्न वाक्य में अवशिष्ट शक्तियाँ क्या सम्मिलित हैं।

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यही कारण है कि इस तथ्य के होते हुए भी हम इस कार्य में लगे कि हमने अनुच्छेद 223 रखा।

मुझे यह भी कहना चाहिए कि इसके बारे में यहाँ कुछ भी व्यर्थ नहीं है जहाँ तक हमारे संविधान का प्रश्न है इसका मात्र कारण यह है कि सभी संघीय संविधानों का यह अभ्यास रहा है कि वह कैद की शक्तियों को बढ़ाये यहाँ तक कि जो अवशिष्ट शक्तियाँ समितियाँ के पास थीं उन्हें भी केन्द्र को दे दिया। उदाहरण के लिए कनाडा के संविधान को देखिए।

भारतीय संविधान की भांति कनाडा का संविधान जिन्हें अवशिष्ट शक्तियां कहते हैं कनाडा की संसद को है। कुछ निश्चित व गिनी हुई शक्तियां प्रदेशां को दी गई हैं। इस तथ्य के होते हुए भी, मैं समझता हूँ कि कनाडा के संविधान के अनुच्छेद 99 में कुछ श्रेणियां और कुछ प्रविष्टियां गिनाता है जिन पर कनाडा की संसद कानून बना सकती है। फ्रेंच राज्यों के डर को दर्शाने के लिए यह दुबारा किया गया जो कनाडा संघ की मुख्य भाग बन गये।

इसी प्रकार, भारत शासन अधिनियम में भी वही योजना लिखी गई और भारत शासन अधिनियम, 1935 का अनुच्छेद 104 यहाँ के अनुच्छेद 223 के समान है। इसमें वह प्रस्तावना भी लिखी गई है कि केन्द्र को अवशिष्ट शक्तियां प्राप्त होंगी। तथापि यहाँ सूची I है। इसलिए यहाँ इस विषय पर दोष निकालने का कोई कारण व आधार नहीं है। ऐसा करने में जैसा मैंने कहा हमने यह जानने के लिए कि अवशिष्ट शक्तियाँ क्या हैं हमने बहुत से राज्यों की आवश्यकताओं का अनुकरण किया है और हमने चिर-परिचित रीति-रिवाजों का अनुकरण किया है जिनका अनुकरण दूसरे संघ संविधान में किया गया है। मुझे आशा है कि सदन न तो मेरे मित्र सरदार हुक्मसिंह के संशोधन को स्वीकार करेगा और न मेरे मित्र नजीरुद्दीन अहमद के कथन पर विशेषकर गंभीरता से विचार करेगा अथवा गंभीरता से लेगा।

(सभी संशोधन अस्वीकार किए गए प्रविष्टि 91 संघ सूची में जोड़ी गई।)

* माननीय सभापति : मैं सोचता हूँ कि इस विन्दु पर दुबारा वाद-विवाद की

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आवश्यकता नहीं है फिर भी यदि डॉ. अम्बेडकर को इसके बारे में कुछ कहना है तो मैं

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 1 सितम्बर, 1949, पृ. 859