224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रविष्टि- 45
* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, मैं अपने दोनों मित्रों श्री शिब्बनलाल सक्सेना और साहू से बहुत भयभीत हूँ, वह इस प्रविष्टि 45 के अर्थ को पूरी तरह से गलत समझे हैं और वे बड़ी अयोग्यता से दबे हैं कि यदि इस प्रविष्टि का निकाल दिया गया तो देश में बिल्कुल भी सट्टा और जुआ नहीं होगा यदि प्रविष्टि 45 वहाँ रहेगी तो इसका प्रयोग सट्टा व जुआ की इजाजत देने के लिए होगा अथवा इसका प्रयोग उनको रोकने के लिए होगा। यदि यह प्रविष्टि वहाँ नहीं रहती है तो प्रान्तीय सरकार इस विषय में पूर्णतः असमर्थ होगी।
मैं आशा करता हूँ कि वे सोचेंगे कि वे क्या कर रहे हैं। यदि इस प्रविष्टि को छोड़ दिया गया तो इसके दूसरे परिणाम होगे कि यह विषय प्रविष्टि 91 के अन्तर्गत अपने आप सूची I में अंतरित हो जायेगा। परिणाम वहीं होगा अर्थात् केन्द्रीय सरकार चाहे जुआ की आज्ञा दे अथवा रोके। इसलिए जो प्रश्न उठता है वह यह है कि यह प्रविष्टि यहाँ रहे अथवा न रहे और जैसा स्पष्ट है अभिव्यक्ततः सूची I में जाये अथवा प्रविष्टि 91 में सम्मिलित हो। यदि मेरे मित्र मन से चाहते हैं कि यहाँ कोई सट्टा और जुआ नहीं होना चाहिए तो संविधान में एक अनुच्छेद को, जो सट्टा व जुआ को अपराध बताये, सम्मिलित होना चाहिए न कि राज्य बर्दाश्त करे। जैसा यह है। यह निवारण विषय है और राज्य को जुआ रोकने की पूर्ण शक्तियां प्राप्त होगी मुझे आशा है कि इस बयान से वह इस प्रविष्टि के अपने एतराज वापस ले लेंगे।
(प्रस्ताव स्वीकार हुआ। प्रविष्टि 45 के राज्य सूची में जोड़ा गया।)
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : क्या मैं आपसे पीछे प्रविष्टि 38 और संशोधन 311 पर जाने का निवेदन कर सकता हूँ जो पंडित लक्ष्मीकान्त के नाम पर है? श्रीमान, मैंने सूना कि आपने इस प्रविष्टि को पीछे रोकने के लिए श्री टी. टी. कृष्णामाचारी को निर्देश दिया था लेकिन मैं अपने मित्र श्री लक्ष्मीकांत के द्वारा सुझाये संशोधन को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ।
माननीय सभापति : बहुत अच्छा। प्रश्न हैः
“ कि सूची II की प्रविष्टि 38, सूची III में अन्तरित कर दी जाए“
(संशोधन स्वीकार किया गया।)
प्रविष्टि 38 समवर्ती सूची में अंतरित की गई।
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 2 सितम्बर, 1949, पृ. 917-916