6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अगर सदन माननीय दोस्त पं. कुंजरू का यह सिद्धांत स्वीकार कर लेता है जिसमें वह यह विवाद कर रहे हैं कि संघीय न्यायालय के न्यायाधीशों को वही वेतन मिलते रहना चाहिए तब इस तरह का संशोधन जिसका उन्होंने प्रस्ताव किया है सुझाने के पीछे शायद कोई तो कारण रहा होगा। इस समय मैं मानता हूँ कि यह बिल्कुल अनावश्यक है और इसे स्वीकार करना असम्भव है क्योंकि यह इस आधार पर पेंशन संस्थापित करने का प्रयत्न करता है कि वर्तमान वेतन जारी रहेगा और यह सिद्ध ांत ऐसा है जिसे सदन ने स्वीकार नहीं किया है।
श्री आर. के. सिधवा : माननीय डॉ अम्बेडकर ने मेरी बात का उत्तर नहीं दिया है कि किस प्रकार संसद मुख्य न्यायाधीश को सुसज्जित घर देने के लिए सक्षम है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : हम इसे अस्वीकार नहीं कर रहे हैं। सुसज्जित घर के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। हम इस पर चर्चा करेंगे।
[ पंडित कुंजरू का संशोधन नकार दिया गया और डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित प्रस्ताव जैसा कि पहले दिखाया गया है स्वीकार कर लिया गया। अनुच्छेद 104, यथा-संशोधित संविधान में जोड़ दिया गया। ]
नया अनुच्छेद 148अ
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं प्रस्ताव रखता हूँः
कि अनुच्छेद 148 के बाद नया अधोलिखित अनुच्छेद राज्यों की विधानपरिषद सन्निविष्ट किया जाएः राज्यों की विधानपरिषद
“148अ. (1) संविधान के अनुच्छेद 148 में लिखित किसी का उन्मूलन या उत्पत्ति
बात को न रोकते हुए, संसद कानून के द्वारा किसी राज्य जिसमें विधानपरिषद हैं उस विधानपरषिद के उन्मूलन के लिए या किसी राज्य जिसमें विधानपरिषद नहीं है वहाँ विधानपरिषद की उत्पत्ति के लिए व्यवस्था कर सकती है, यदि उस राज्य की विधानसभा उसकी पूर्ण सदस्यता के बहुमत द्वारा और विधानसभा में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत के द्वारा प्रस्ताव पारित करती है।
(2) इस अनुच्छेद की धारा (1) के संदर्भ में किसी कानून में संविधान के संशोधन के लिए ऐसे उपबंध होंगे जो उस कानून के इन उपबंधों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक हो सकते हैं और ऐसे प्रासंगिक तथा परिणामी उपबंध भी हो सकते हैं
* . सीएडी, खण्ड IX, 30 जुलाई, 1949, पृ. 13-14