262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कि यह वांछनीय है कि संसद के पास इस अनुसूची को संशोधन करने की शक्तियाँ होनी चाहिए। इसका कोई उपयोग नहीं है कि राज्य में एक अन्य राज्य पैदा किया जाए। यह वांछनीय नहीं है कि इस प्रकार का विशेष उपबंध जिसके अधीन कुछ कबीले विधानमंडल एवं संसद द्वारा बनाये कानूनों के साधारण प्रवर्तन से अलग कर दिये जाएं और पैरा 5 के उपपैरा (2) के उपबंध से मानों राज्यपाल कुछ प्रकृति के कानून बनाने के लिए कानून बनाने वाली संस्था है जिसका जिक्र (क) (ख) (ग) में है और जो इस बारे में संसद अथवा विधानमंडल द्वारा बनाये कानूनों को पर अध्यारोही शक्ति रखते हैं, सदैव के लिए घिसे-पिटे सूत्र नहीं होने चाहिए और समय तथा हालात के अनुसार बदलाव करने के लिए संसद स्वत्रंत होनी चाहिए। परिणामस्वरूप, भाग IV के नये पैरा 7 में यह व्यवस्था की गई है कि संसद जैसा आवश्यक समझे, संशोधन करने की शक्तियां रखेगी और अनुसूची के ऐसे कोई संशोधन संविधान के संशोधन नहीं समझे जाएंगे। लेकिन कानून की साधारण प्रक्रिया से किये जाएंगे। मैं यह कहना चाहूँगा कि प्रारूपण समिति ने इस नई अनुसूची पर प्रान्तों के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श किया जिनका सम्बन्ध इस विशेष से है जैसे अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजातियां। हमने अपने आदरणीय मित्र श्री ठक्कर की राय पर भी विचार किया जिनको इस विषय मामले की विशेष जानकारी है और मुझे बिना खंडन के कहना चाहिए कि इस नयी अनुसूची को सभी पार्टियों की, जिनका सम्बन्ध इस मामले से है स्वीकृति प्राप्त है, और मुझे आशा है कि सदन को पुरानी अनुसूची के स्थान पर नई अनुसूची स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होगी।
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* माननीय सभापति : जहाँ तक मैं देख सकता हूँ, पांचवी अनुसूची का कोई संशोधन नहीं है जो अब प्रस्तावित हो।
प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना : मेरे पास कुछ संशोधन हैं,
माननीय सभापति : अन्तिम क्षण में, यह संशोधन सदस्यों में नहीं घुमाये गये हैं। यह आज सुबह 8.58 पर आये।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : उनके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है। इनको आज्ञा नहीं मिलनी चाहिए।
माननीय सभापति : यदि आपके पास कोई संशोधन है, आपको उसके बारे में बताना चाहिए। मुझे सदन को बता देना चाहिए कि हमारे पास भी शिब्बनलाल सक्सेना तथा श्री देशमुख द्वारा भेजे गये नए संशोधनों का पुंज है।
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 5 सितम्बर, 1949, पृ. 978-79