268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना : महोदय, मैंने अपने भाषण में इस तथ्य का उल्लेख किया है।
माननीय सभापति : क्या डॉ. अम्बेडकर इस स्तर पर कुछ कहना चाहेंगे?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमान, यदि आप पसन्द करें तो अभी जो आदरणीय सदस्य बोलना चाहते हैं उन्हें बोलने दीजिए।
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* माननीय सभापति : मैं डॉ. अम्बेडकर को उत्तर देने के लिए बुलाऊँगा। मैं समझता हूँ कि अच्छा होगा कि हम इसे अभी समाप्त कर लें। हम काफी चर्चा कर चुके हैं।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : इस प्रश्न पर हमने दो घंटे बहस की है और मैं समझता हूँ कि बहस अधिकतर उन मुद्दों पर थी जिनका सम्बन्ध अनुसूची से नहीं है। यह वह समय है जब हमने अनुसूची को लिया है जब तक विशेष सदस्य कुछ नया न कहें, हमें बहस जारी रखने की आवश्यकता नहीं है।
माननीय सभापति : मैं उत्तर देने के लिए आपको पहले ही पुकार चुका हूँ।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमान, मैं आपका बहुत आभारी हूँ। हमारे सम्मुख दो संशोधन थे और मेरा प्रस्ताव है कि बहस का उत्तर देने से पूर्व उनसे निपट लिया जाए।
पहला संशोधन श्री चाल्हिया द्वारा पेश किया गया संख्या 100 है। इसके सम्बन्ध में मैं नहीं समझता कि यह पैरा 2 के उपपैरा (5) में किस प्रकार उचित है। उपपैरा (5) मात्र क्षेत्रीय और जिला परिषदों के क्षेत्र के बारे में है। यह किसी निदेशां के बारे में कुछ नहीं करता जो राज्यपाल अथवा राज्य के विधानमंडलों द्वारा दिए जाएं। हम वैसे ही जिला परिषद व क्षेत्रीय परिषद बना रहे हैं। यदि माननीय सदस्य इस प्रकार का कोई संशोधन पेश करना चाहते हैं तो उन्हें समुचित उपबंध करना चाहिए। यह अनुसूची जिला परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों की विषय-वस्तु के बारे में है इसलिए इस विशेष स्थान पर इस संशोधन के औचित्य को समझने में मैं असफल हूँ।
संशोधन संख्या 257 के बारे में जिसके द्वारा आदरणीय सदस्य परिषद सदस्य संख्या 15 तक सीमित करना चाहते हैं दुबारा मुझे यह अति अनावश्यक प्रतिशत होता है क्योंकि मेरा अपना संशोधन कहता है, “चौबीस से अधिक नहीं“। अधिक से
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 6 सितम्बर, 1949, पृ. 1024-1028