अनुच्छेद 150 - Page 29

8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अनुच्छेद 150

* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँः कि अनुच्छेद

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150 के लिए, अधोलिखित प्रतिस्थापित किया जायः

“150 (1) किसी राज्य की विधानपरिषद् जिसमें इस प्रकार की विधान परिषद्ो विधानपरिषद् है के सदस्यों की कुल संख्या उस राज्य की का संघटन विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के पच्चीस प्रतिशत से का संघटन

अधिक नहीं होगी :

बशर्ते कि किसी राज्य की विधान परिषद् के सदस्यों की कुल संख्या किसी भी सूरत में चालीस से कम नहीं होगी।

(2) किसी राज्य की विधानपरिषद् की सीटों का वितरण, उन सीटों को भरने के लिए व्यक्तियों के चुनाव की प्रक्रिया, इस तरह चुने जाने वाले व्यक्तियों का योग्यताओं से युक्त होना और वह योग्यता, जो व्यक्तियों को इस प्रकार के व्यक्तियों के चुनाव के लिए मतदान करने का अधिकारी बनाती है, संसद के द्वारा सिफारिश किए गये कानून के अनुसार होंगे।

मूल अनुच्छेद का प्रारूपण समिति के प्रथम प्रारूप के अनुच्छेद 60 में अंशतः प्रतिरूपण कर दिया गया था। अब, सदन याद करेगा कि मूल प्रारूप का अनुच्छेद 60 केन्द्र में उच्च/ऊपरी सदन के संघटन से सम्बन्धित है। किन्हीं कारणों से जिनमें हमें अभी जाने की आवश्यकता नहीं है, सदन ने पुराने अनुच्छेद 60 में निहित सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया था। इसलिए प्रारूपण समिति ने महसूस किया कि उस सिद्धांत को बनाये रखना सुसंगत नहीं होगा जिसको राज्यों के लिए ऊपरी सदन के संघटन में पहले से ही त्याग दिया गया है। परिणामस्वरूप, प्रारूपण समिति के सामने कोई विकल्प सुझाने की समस्या नहीं आयी। अब मुझे अवश्य स्वीकार करना चाहिए कि ऊपरी सदन के संघटन के सम्बन्ध में प्रारूपण समिति किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी थी। फलस्वरूप उन्होंने निर्णय लिया- आप कह सकते हैं कि उन्होंने मुसीबत को केवल आगे बढ़ा दिया-मामले को संसद पर छोड़ दिया। इस समय मैं नहीं सोचता कि प्रारूपण समिति कोई निश्चित प्रस्ताव सदन के अपनाने के लिए सुझा सकती थी और इसलिए उन्होंने वह अपनाया है जिसका अनुच्छेद 150 के उपखण्ड (2) का प्रस्ताव करने के लिए कम से कम संविधान सिफारिश करता है कि कुछ राज्यों में द्वितीय सदन होगा, जैसा कि अनुच्छेद 148 में हैं, लेकिन

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, 30 जुलाई, 1949, पृ. 21-22