अनुच्छेद 150 - Page 30

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द्वितीय सदन के गठन का मामला संसद पर छोड़ दिया गया है।

निःसंदेह ये अनियमिततायें हैं। इस समय इन अनियमितताओं को दूर करने के लिए कोई तरीका नहीं है और इसलिए मैं सदन से अभी के लिए जैसा कि अनुच्छेद 150 में सन्न्हित है प्रारूपण समिति के प्रस्ताव जो मैंने रखा है को स्वीकार करने का आग्रह करता हूँ।

[ सूची III (प्रथम सप्ताह) की संशोधन संख्या 90 प्रस्तावित नहीं की गई ]

श्री एच. वी. कामथः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ :

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“कि संशोधन के संशोधन की सूची I (प्रथम सप्ताह) की संशोधन सं. 5 में, प्रस्तावित अनुच्छेद 150 की धारा (2) में ‘चुने जाने के लिए योग्यतायें होना‘ शब्दों को परिषद् की सदस्यता के लिए योग्यतायें और अयोग्तायें‘ शब्दों से प्रतिस्थापित किया जाय।“

सदन ध्यान देगा कि राज्य विधानपालिका के सदस्यों के चुनाव के संबंध में एक पूर्व अवसर पर उन्होंने संबद्ध हिस्सों में विभिन्न अनुच्छेदों को अपनाया। मैं उदाहरणार्थ सदन का ध्यान अनुच्छेद 167 पर आमंत्रित करूंगा जो कि विधानसभा की सदस्यता के लिए अयोग्यताओं के साथ उन योग्यताओं को निर्धारित करता है जो पहले व्यक्त की जा चुकी हैं। द्वितीय सदन में प्रतिनिधित्व प्रदान करने और इस परिषद् के सदस्यों के चुनाव के लिए मैं नहीं समझता कि क्यों इस सदन को समान वैधता, समान कारण तथा समान बल से ऊपरी सदन में चुने जाने वाले सदस्यों की केवल योग्यताओं का ही नहीं बल्कि अयोग्यताओं का भी निर्धारण नहीं करना चाहिए।

अनुच्छेद 167 निर्धारित करता है कि कैसे विभिन्न परिस्थितियों के अंतर्गत किसी सदस्य को किसी राज्य की विधानसभा और विधानपरिषद् का सदस्य चुने जाने के लिए अयोग्य करार दिया जाना है। इसलिए मैं कोई कारण नहीं देखता जिसकी वजह से यही बात उस अनुच्छेद 150 में साफ तौर पर नहीं कही जानी चाहिए जिसका डॉ. अम्बेडकर ने प्रस्ताव किया है।

इस अनुच्छेद के बारे में एक और महत्वपूर्ण बात है और वह यह है। नया अनुच्छेद निर्धारित करता है कि विधानपरिषद् के सदस्यों की कुल संख्या निचले सदन के सदस्यों की कुल संख्या की एक-चौथाई या 25 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। यह आगे भी एक उपबन्ध में निर्धारित किया जाता है “बशर्ते कि किसी राज्य की विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या किसी भी सूरत में चालिस से कम नहीं हो, इन स्थितियों में इन दोनों का मेल कैसे हो सकता है। # उदाहरणार्थ -