270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का ढंग उनकी आदतें, जिन्दगी के तरीके इतने सुभिन्न हैं कि उनको एक स्थान पर लाना खतरनाक होगा अर्थात् श्वेत लोगों के लिए श्वेत लोगों द्वारा और श्वेत सभ्यता के लिए बनाई गई विधियों के अन्तर्गत।
मैं मानता हूँ कि जिस आधार पर संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लाल भारतीयों के लिए किया गया था किसी हद तक उसी तरह हम क्षेत्रीय और जिला परिषदें बना रहे हैं। लेकिन मेरा प्रश्न है कि जिन्होंने इस तथ्य के आधार पर अनुसूची की आलोचना की है, जैसे कि हम क्षेत्रीय व जिला परिषद बना रहे हैं, बाध्य करने वाले तथ्यों को समझने में असफल हुए हैं जो हमने इस संविधान में रखे हैं। इसलिए मैं कुछ उपबंधों का हवाला देना चाहूँगा जो इस पृथकता को निष्प्रभावी करते है।
पहली बात जो हमने की है यह है कि हमने प्रावधान किया है कि कार्यपालक प्राधिकार का विस्तार असम में केवल गैर-जनजाति क्षेत्रों तक ही नहीं होगा। अपितु जनजाति क्षेत्रों तक भी अर्थात् असम सरकार का कार्यापालक अधिकार उन क्षेत्रों में भी कार्य करेगा जो स्वशासी जिलों में है। जैसा देखने को मिलेगा, यह भारत शासन अधिनियम, 1935 के उपबन्धों के ऊपर बड़ा सुधार है। उस अधिनियम में पाये जाने वाले उपबन्धों में कार्यपालका अधिकार दो श्रेणियों में विभाजित था एक राज्यों की सरकार कही जाती थी और दूसरा कार्यपालक अपने विवेकाधिकार राज्यपाल में की जाती थी, जहाँ तक जनजाति क्षेत्रों का सम्बन्ध था। असम में यह जनजाति क्षेत्रों पर ही लागू नहीं होती थी किन्तु दूसरे क्षेत्रों में पूर्णतः पृथक हुए क्षेत्रों तक। कार्यापालक अधिकार उन क्षेत्रों पर लागू नहीं था बल्कि अपने विवेकाधिकार में राज्यपाल था। हमने भेदभाव को नष्ट कर दिया है इसलिए स्वशासी जिलों सहित जनजाति क्षेत्र अब राज्य सरकार के अधिकार में हैं, वह वस्तु जो बाध्य करने वाली है जिसके लिए आदरणीय सदस्यों ने कोई ध्यान नहीं दिया है यह है जो ऐसे कार्यों को रोक रही है जैसे कानून बनाना कुछ स्पष्ट क्षेत्रों में जैसे रुपया उधार देना, भूमि इत्यादि। और रोक रही है कुछ न्यायिक कार्य जो ग्राम पंचायत अथवा क्षेत्रीय परिषदों अथवा जिला परिषदों, संसद का प्राधिकार अथवा असम विधानमण्डल का अधिकार जो क्षेत्रीय परिषदों और जिला परिषदों तक विस्तारित है। कानून बनाने के विषय में वे संसद के प्राधिकार से विमुक्त नहीं हैं और न ही वे जो उद्देश्य नये संशोधन का है- उच्च न्यायालय के अथवा उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से विमुक्त हैं निवेदन है कि यह एक आबद्धकर प्रभाव है।
इसमें दूसरा बाध्यकारी प्रभाव यह है कि संसद द्वारा बनाये तथा असम के विधानमंडल द्वारा बनाये गये कानून अपने आप इन क्षेत्रीय परिषदों और जिला परिषदों पर लागू होंगे जब तक कि राज्यपाल नहीं सोचता कि वे लागू नहीं होने चाहिए। दूसरे शब्दों में, यह दिखाने का भार राज्यपाल पर डाल दिया गया है कि संसद अथवा असम विधानमंडल