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अन्तर है। मैं समझता हूँ कि मेरी योजना मूल रूप से बहुत अधिक सुसंगत है।
अर्थात् जनजाति लोगों को कुछ विषयों के बारे में विधि निर्माण के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त एक अन्तनिर्हित अधिकार प्राप्त हो ऐसा होने पर मेरा पैरा (3) योजना से कहीं ज्यादा मिलता है और असम मंत्रिमंडल को राज्यपाल को सलाह देने की कुछ शक्तियाँ देता है कि उसे कोई विधि स्वीकार करनी चाहिए अथवा नहीं करनी चाहिए। विधानमंडल का हस्तक्षेप बिल्कुल अनावश्यक है।
श्री रोहिनी कुमार चौधरी : यदि मैंने डॉ. अम्बेडकर को सही समझ लिया होता, तो अपने संशोधन को वापिस लेने के लिए तैयार हो गया होता। मेरा मतलब है, यदि मंत्रालय राज्यपाल को सलाह देगा और विधानमण्डल की राय मंत्रालय लेगा तब मुझे कोई एतराज नहीं है। यदि मंत्रालय की सलाह का अर्थ है कि मंत्रालय उस समय तक कोई कार्यवाही नहीं करेगा जब तक सदन को इस पर बाद-विवाद करने का अवसर न मिले, तब मैं सोचता हूँ कि यह वही चीज है जिसे मैं चाहता हूँ और डौ. अम्बेडकर चाहते हैं। ऐसी दशा में, मैं वापिस लूंगा।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं समझता हूँ कि मैंने जितना कहा है बिल्कुल
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वह उससे कहीं अधिक समझ गये हैं। मैं उनको यह आश्वासन दिलाने के लिए तैयार नहीं हूँ।
(संशोधन अस्वीकार किया गया। पैरा 3 संशोधित रूप में अनुसूची में जोड़ा गया।)
पैरा 4
* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, मेरा प्रस्ताव है “कि पैरा 4 के उपपैरा (1) में अथवा इस अनुसूची के पैरा 3 के अधीन बनी किसी विधि से उत्पन्न व “शब्दों और अंकों को लुप्त कर दिया जाए।
ये अनावश्यक हैं।
श्रीमान, मेरा यह भी प्रस्ताव है :
“कि पैरा 4 के उपपैरा (2) में “ऐसे वादों या मामलों पर अपीली का क्षेत्राधिकारिता होगी और ऐसी क्षेत्रीय परिषद अथवा जिला परिषद या न्यायालय का फैसला अन्तिम होगा“ शब्दों के स्थान पर “सिवाय उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय को ऐसे वादों या मामलों पर अधिकारिता होगी।’’ शब्द रखे जाएँ।
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 6 सितम्बर, 1949, पृ. 1033