276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्रीमान, मेरा प्रस्ताव है :
“कि पैरा 4 के उपपैरा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उप-पैरा जोड़ा जाए-
(3) असम के उच्च न्यायालय की उन वादों और मामलों पर अधिकारिता होगी या उसका प्रयोग करेगा जिनपर इस पैरा के उपपैरा (2) के उपबंध लागू होते हैं, जो राज्यपाल समय-समय पर आदेश द्वारा विर्निदिष्ट करे।“
यह संशोधन एक महत्वपूर्ण बदलाव लाता है। मूलरूप से पैरा 4 के उपपैरा (2) के अधीन जिला न्यायालय का फैसला अन्तिम था अब हमने व्यवस्था की है कि वे उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार के अधीन होंगे जो आवश्यक उपबन्ध था।
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* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमान, मुझे कहना चाहिए कि मैं अपने
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मित्र द्वारा पूछे गये प्रश्नों से अचम्भित था। मैं समझता हूँ कि वे अपने आप उत्तर दें। किन्तु अब मैं उत्तर दूंगा क्योंकि उन्होंने प्रश्न मुझसे पूछे हैं।
प्रथम प्रश्न के बारे में, क्या जनजाति क्षेत्र में स्थापित अदालतों में वकीलों को पेश होने की आज्ञा मिलेगी, उत्तर बहुत आसान है। पहले तो प्रांतीय सरकार के पास तीसरी सूची की प्रविष्टि के अधीन जो वृतियों के बारे में कानून बनाने की शक्ति प्राप्त होगी और यदि उस विधि के अधीन वे व्यवस्था करते हैं कि उस जिले के न्यायालयों में हाजिर होने के वकील अधिकारी होंगे जिन्हें स्वशासी जिले कहा जाता है तब वह कानून लागू होगा जब तक राज्यपाल का विचार यह न हो कि विधि लागू नहीं होनी चाहिए। इसलिए वह विषय बिल्कुल स्पष्ट है।
इस पैरा के अधीन सृजित (ट्रिबूनल) अधिकार के फैसलों के विरुद्ध अपील के प्रश्न के उत्तर के बारे में, फिर भी पैरा में बिल्कुल स्पष्ट व्यवस्था की गई है कि अपील के न्यायालय बनाये जाएँ। अब राज्यपाल अथवा प्रान्तीय मंत्रालय अपील के नये न्यायालय सृजित करें जिनमें अपील के मामले उन अदालतों में जाएं अथवा जिला न्यायाधीश न्यायालय को अपील न्यायालय घोषित करे जो पंचायत व दूसरी अदालतों के फैसलों के विरुद्ध अपील सुनें। इसलिए, दुबारा अपील का उपबन्ध है। अब मेरे संशोधन को उसके पश्चात् भी अपील जिला अदालत से उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय में अपील होगी।
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 6 सितम्बर, 1949, पृ. 1035-36