278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, मेरा प्रस्ताव है :
’कि पैरा 10 के उपपैरा (2) में ’ऐसे विनियम’ के स्थान पर ’विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले, ऐसे विनियम’ शब्द रखे जाएं।
यह केवल प्रारूपण का बदलाव होगा।
मैं भी प्रस्तावित करता हूँ :
’कि पैरा 10 के उपपैरा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपपैरा जोड़ दिया जाएः
’(3) इस पैरा के अधीन निर्मित सभी विनियम तुरंत राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे और जब तक उसके द्वारा अनुमति न दी जाए तब तक प्रभावी नहीं होंगे।’
(संशोधन स्वीकार हुआ।)
* * * *
** माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : क्या मैं एक-दो शब्द उस विषय पर कह सकता हूँ जिसके बारे में मेरे मित्र भयंकर रूप से उत्तेजित हैं? यहाँ रक्षोपाय के द्वारा तीन चीजें उपबंधित की गई हैं जिन पर मेरे मित्र ने ध्यान नहीं दिया है। पैरा 10 का प्रथम परन्तुक कहता हैः ’परन्तु कोई ऐसे विनियम इस पैरा में नहीं बनाने चाहिएं जब कि वे जिला परिषद की सदस्य संख्या के कम से कम तीन-चौथाई बहुमत से पारित नहीं कर दिए जाते।’ यह पहला रक्षोपाय है। दूसरा रक्षोपाय प्रारूप संविधान के पृष्ठ 184 पर है। वह कहता है, ’परंतु यह कि ऐसे किन्हीं विनियमों के अधीन महाजन (ऋण देने वाले) अथवा व्यापारी को अनुज्ञप्ति देने से मना करने की क्षमता नहीं होगी जो ऐसे विनियमों के बनने से पहले जिले में (जिले की सीमा के भीतर) ऐसे व्यापार कर रहे हों।’ अतः मौजूदा अधिकार प्रभावित नहीं हैं।
तीसरे, जो संशोधन मैंने पेश किया है उसकी ओर मेरे मित्र ने ध्यान देने की चिन्ता नहीं की है अर्थात् “इस पैरा के अधीन बने सभी विनियम तुरन्त राज्यपाल को प्रस्तुत किए जाएंगे और जब तक कि उसके द्वारा स्वीकार नहीं होंगे, तब तक प्रभावी नहीं होंगे।“
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 6 सितम्बर, 1949, पृ. 1041
** ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 6 सितम्बर, 1949, पृ. 1041-42