अनुच्छेद 150 - Page 32

11

सदन के लिए कम से कम संख्या 40 थी तो उड़ीसा में ऊपरी सदन संख्या के अनुसार निचले सदन से असंतुलन होगा अब मैं सोचता हूँ मेरे मित्र, श्री नजीरुद्दीन अहमद ने उन परिस्थितियों पर विचार नहीं किया है जिन पर मध्यान्ह के दौरान हस्तक्षेप किया गया था। उदाहरणार्थ वे बिल्कुल भूल गये हैं कि उड़ीसा में कुछ ऐसे राज्यों का विलय हो जाने के बाद वह पहले से कहीं बड़ा राज्य हो गया है जो पहले उड़ीसा से स्वतंत्र थे और मैं समझता हूँ कि उन राज्यों के क्षेत्रफल और जनसंख्या को देखते हुए जो कि उड़ीसा की सीमाओं में शामिल की जायेंगी, निचले सदन में सदस्यों की संख्या 150 के आस-पास होगी। फलतः किसी असमानता की संभावना जिसकी ओर उन्होंने संकेत किया है अब नहीं है। मैं इस समय यह भी कह सकता हूँ कि यदि सदन अनुच्छेद 172 में जो कुछ प्रस्तावित है को पारित कर देता है जो ऊपरी सदन तथा निचले सदन के बीच मतान्तर के प्रश्न को नियमित करता है तो निचले सदन तथा ऊपरी सदन के बीच सिद्धांतों की असमानता का प्रश्न अपनी महत्ता खो देता है क्योंकि अनुच्छेद 172 के अंतर्गत अब हम उस समान प्रक्रिया को अपनाने का और प्रस्ताव नहीं करते जो केन्द्र में दोनों सदनों के संबंन्ध में अपनायी गयी थी। हम इसका प्रस्ताव करते हैं कि कुछ विशेष परिस्थितियों में निचले सदन का मत ऊपरी सदन के मत पर हावी होगा। फलतः ऊपरी सदन के पास अलग राजनीतिक स्वरूप होने की वजह से निचले सदन के बहुमत या भारी बहुमत के निर्णय को उलट सकने की सम्भावना नहीं होगी। मैं सोचता हूँ यह मेरे माननीय मित्र नजीरुद्दीन अहमद द्वारा उठाये गए चर्चा के पहले बिन्दु को पूर्णतया सुव्यवस्थित कर देता है।

मैं दूसरे प्रश्न पर आता हॅू जिसे मेरे माननीय मित्र, पं. लक्ष्मीकांत मैत्रा ने पुरजोर तरीके से उठाया है। उनका तर्क थाः यह संसद पर क्यों छोड़ना चाहिए? यह संसद पर कैसे छोड़ा जा सकता है ? मैं सोचता हूँ कि जो उत्तर मैं उन्हें किसी भी कीमत पर दे सकता हूँॅ जहाँ तक इसका मुझसे संबंध है संतोषजनक है। प्रथम दृष्टि में मैं उन्हें यह संकेत करना चाहूँॅगा कि यह नहीं मानना चाहिए कि प्रारुपण समिति ने किसी भी चरण में ऊपरी सदन के संघटन के लिए स्वयं संविधान में रचनात्मक प्रस्ताव नहीं रखा। यदि मेरे माननीय मित्र याद करेंगे कि मेरे और मेरे मित्र श्री टी. टी. कृष्णमाचारी के नाम में संशोधन के संशोधन की उस समेकित सूची की संशोधन संख्या 139 है जो बांटी जा चुकी है और उसमें वह पायेंगे कि ऊपरी सदन के संघटन के लिए रचनात्मक सुझाव दिया है। दुर्भाग्य से वह किसी अन्य स्थान पर स्वीकार नहीं किया गया है और परिणामस्वरूप हम नहीं सोचते कि इस तरह के संशोधन के लिए दबाव दिया जाना उपयुक्त है। इसलिए वे देखेंगे कि प्रारुपण समिति को उन सभी दोषों से अवश्य मुक्त कर दिया जाना चाहिए जो इस पर इस