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12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मुश्किल को हल करने में किए गये प्रयत्न की वजह से हो सकते हैं; उन्होंने प्रयत्न अवश्य किया लेकिन वे सफल नहीं हुए। मेरे माननीय मित्र इसका भी अनुभव करेंगे कि प्रारुपण समिति के समक्ष एक साथ 28 संशोधन इस विषय पर रखे गये। वे इस सूची में 123 से 148 तक हैं। यदि वे उन संशोधनों को विस्तार से ध्यानपूर्वक पढं़े तो उन्हें चकित कर देने वाले सुझावों की विविधता, विरोधी दृष्टिकोणों और विभिन्न संशोधनों का प्रस्ताव करने वालों की अपनी स्थिति से लचीला होने तथा एक समान निष्कर्ष पर पहुँचने की अनिच्छा का पता चलेगा। इस मुश्किल परिस्थिति की वजह से प्रारुपण समिति ने सोचा कि ऐसा सुझाव रखने के स्थान पर जो सदन को बहुमत से स्वीकार नहीं होगा, मामले को संसद पर छोड़ दिया जाए।

श्री एच. वी. कामथ : क्या डॉ. अम्बेडकर को पक्का यकीन है कि संसद को कम विविधताओं का सामना करना पड़ेगा ?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यदि मेरे माननीय मित्र मुझे समय देंगे तो मैं

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उस भाग का उत्तर भी दूंगा।

मेरे माननीय मित्र पं. मैत्रा कहते हैंः इसकी कल्पना कैसे की जा सकती है कि संविधान के उस हिस्से को जिसका ऊपरी सदन से सम्बन्ध है संसद द्वारा निश्चित किए जाने के लिए और जिसकी संविधान में व्यवस्था न करने के लिए कैसे छोड़ सकते हैं? मैं सोचता हूँ मेरे माननीय मित्र पं. मैत्रा अनुभव करेंगे और मैं उन्हें निश्चित रूप से बताना चाहूँगा कि राज्यों तथा केन्द्र दोनों में निचले सदन के सम्बन्ध में क्या व्यवस्था कर रहे हैं। यदि वे अनुच्छेद 149 देखेंगे जिसे हम पहले ही पारित कर चुके हैं तो उसमें हमने इतना ही कहा है कि चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन को संचालित करने के लिए कुछ निश्चित सिद्धांत होंगे, लेकिन चुनाव क्षेत्रों को परिसीमित करने का वास्तविक कार्य स्वयं संसद पर छोड़ दिया गया है और जब तक संसद केन्द्र में निचले सदन के लिए विभिन्न क्षेत्रों को परिसीमित करने के लिए कानून नहीं बनाती तब तक निचले सदन का गठन सम्भव नहीं होगा।

पं. लक्ष्मीकांत मैत्रा : यह अवश्यंभावी है।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : फिर एक अन्य स्पष्टीकरण लें, उदाहरणार्थ,

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सीटों का वितरण। वास्तविक वितरण संसद द्वारा बनाये गये कानून द्वारा किया जायेगा। इसलिए यदि ऐसे तफ्सील के मामले संसद पर कानून द्वारा तय किए जाने हेतु छोड़े जा सकते हैं तो मैं नहीं समझता कि ऊपरी सदन के संघटन से सम्बन्धित मामले को संसद पर छोड़ने के लिए कोई गम्भीर आपत्ति होगी। मैं बिल्कुल भी कोई आपत्ति नहीं देखता। दूसरे, मैं व्यक्तिगत रूप से महसूस करता हूँ कि विरोधी दृष्टिकोणों जो कि सदन के सामने 28 संशोधनों में प्रस्तुत किए गये हैं मैंने