अनुच्छेद 282-ख - Page 327

306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अवश्य ही नौकरी से हटाने का आधार होगा। संसद यह कहने में स्वतंत्र होगी कि किन स्थितियों में पदच्युत्ति आवश्यक नहीं है। संसद को राजनैतिक अपराधों को अलग करने की पूर्ण स्वतंत्र होगी, यह खण्ड स्पष्ट शब्दों में नोटिस देने के बारे में है। राजनैतिक प्रकार के अपराधों के और ऐसे अपराधों का जिनमें नैतिक अधमता नहीं है दण्ड से छूट दे सकती है। संसद की यह स्वतंत्रता उपखण्ड (क) से न तो प्रभावित है और न ही सीमित है।

मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि उपखण्ड (ख) के बारे में, यह भारत शासन अधिनियम के अनुच्छेद 240 से मूर्त रूप में लिया गया है। मैं समझता हूँ इस पर सहमत होंगे कि भारत शासन अधिनियम के अनुच्छेद 240 को लागू करना नौकरियों को संरक्षण देना था तो भी यहाँ तक कि अंगरेज जो असैनिक नौकरियों को संरक्षण देने में रूचित लेते थे, उपखण्ड (ख) की तरह का परन्तुक लागू करना आवश्यक समझते थे। इसलिए हमने कोई नई बात लागू नहीं की है, जो पहले नहीं आई है। उपखण्ड (ग) के बारे में यह महसूस किया गया है कि कुछ स्थितियां हो जहाँ मात्र आरोप के प्रकटन मात्र से राज्य की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है इसलिए यह व्यवस्था की गई है कि उपखण्ड (ग) के अधीन राष्ट्रपति को कह सकता है कि कुछ स्थियिं में नोटिस की तालीम नहीं की जायगी। मैं समझता हूँ कि वह एक बहुत इज्जत देने वाला उपबन्ध है। और प्रकट आलोचना में राष्ट्रपति के लिए उपखण्ड (ख) के उपबंधों को खारिज करने के द्वार खोलता हैं, मैं यह सोचने लगा हूँ कि राज्य के अधिक हित में इसे रखना चाहिए।

अब खण्ड तीन पर आता हूँ इसे इरादे से समाविष्ट किया गया है मान लीजिए

खण्ड (3) न हो तो स्थिति क्या होगी? स्थिति यह होगी कि कोई व्यक्ति जिसे उपखण्ड (क) (ख) अथवा (ग) के अधीन नोटिस नहीं दिया गया है अदालत जाने का और यह कहने का हकदार होगा कि उसे कारण बताने का अवसर दिए बिना नौकरी से पष्थक किया गया है, अब, समाधान शब्द के विषय में न्यायालयों के भिन्न भिन्न विचार है; यह अधिकारियों की व्यक्तिपरक मनःस्थिति है, अथवा वस्तुपरक दशा है अर्थात् हालात पर आधारित हैं? इस प्रकार के मामले में यह महसूस किया गया है, कि अदालत के अधिकार क्षेत्र को बाहर रखने और अधिकारी के फैसले को अन्तिम बनान बेहतर है इसी कारण यह खण्ड (3) समाविष्ट किया गया है कि कोई न्यायालय प्रश्न नहीं कर सकेगा यदि अधिकारी महसूस करता है, कि पर्याप्त नोटिस देना व्यवहारिक नहीं है अथवा राष्ट्रपति सोचता है कि कुछ हालात में नोटिस देने की आवश्यकता नहीं है।

अब, दूसरी आशंका है जिसे मुझे स्पष्ट करना चाहिए। कुछ लोग सोचते हैं कि असैनिक सेवाओं के बारे के उपबन्धों के अधीन जिसे मैंने समाविष्ट किया है, सरकार के पास गैर-सैनिक अधिकारियों को नौकरियों से निकालने का एक विविध अधिकार