अनुच्छेद 282-(ग) - Page 328

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है और यह शक्त्ति खण्ड (2) के उपखण्ड (क), (ख), (ग) द्वारा बढ़ा दी गई है।

मैं निवेदन करता हूँ कि वह दुबारा विना रुकावट का है क्योंकि लोक सेवा आयोग से सम्बन्धित उपबन्धों के अधीन जिनको हमने पहले ही पारित किया है, एक उपबन्ध है कि प्रत्येक व्यथित गैर-सैनिक अधिकारी जिसकी सेवाओं के बारे में अधिकारी द्वारा कार्यवाही की गई है लोक सेवा आयोग में अपील कर सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में भी, जहाँ सरकार ने अधिकारी को कारण बताने का अवसर नहीं दिया है यद्यपि ऐसे अधिकारी को लोक सेवा आयोग में जाने का और अपील करने का अधिकार होता है कि उसकी सेवा के सम्बन्ध में बनाये गये उपबन्धों के विरूद्ध गलत तरीके से नौकरी से अलग कर दिया गया है इसलिए मैं सोचता हूँ कि यह उपधारणा जिसे आदरणीय सदस्य द्वारा बयान किया गया है, अनुच्छेद के उपबंधों के बारे में पूरी तरह आधार रहित हैं। इस कानून के उपबन्धों के अनुच्छेद 282 के उपबन्ध के तथा लोक सेवा आयोग के उपबंधों के गलत समझने के कारण है।

(कुल मिलाकर 15 संशोधन अस्वीकार किए गए, डॉ. अम्बेडकर का मूल संशोधन तथा अनुच्छेद 282 ख स्वीकार किए गये और संविधान में जोड़े गये।)

अनुच्छेद 282-(ग)
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* माननीय सभापति : इस अनुच्छेद का कोई अन्य संशोधन नहीं है। डॉ. देशमुख, आप बोलना चाहते थे।

डॉ. पी. एस. देशमुख : शब्दों के छोड़ने के बारे में मेरे मित्र श्री बृजेश्वर प्रसाद द्वारा पेश किए गये संशोधन का मैं समर्थन करता हूँ।

“यदि विधान परिषद ने दो तिहाई अन्यून उपस्थिति व मत देने वाले सदस्यों से समर्थित संकल्प द्वारा घोषित किया है ऐसा करना राष्ट्रहित में आवश्यक अथवा समुचित है।“

मैं इसी प्रकार का संशोधन संख्या 250 पेश करना चाहता हूँ लेकिन उसे मैं अब पेश नहीं करना चाहता क्योंकि एक मिलता-जुलता संशोधन पेश हो चुका है। मैं इस उपबंध को समझ नहीं पा रहा हूँ। केन्द्रीय संसद में लोकसभा को छोड़कर किसी अन्य सदन के लिए किसी महत्वपूर्ण मामले में पहल नहीं छोड़ी गयी है। किन्तु यहाँ प्रथम बार मेरी जानकारी और सूचना के अनुसार हम विधान परिषद को पहल दे रहे है; श्रीमान, केन्द्रीय सेवायें या तो वाँछनीय हैं अथवा वाँछनीय नहीं हैं यदि वे

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 8 सितम्बर, 1949, पृ. 1118