प्रविष्टि 58 - Page 343

322 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय सभापति : यह वही मुद्दा है जिसे श्री कृष्णमाचारी ने उठाया है।

श्री आर. के. सिधवा : नहीं, श्रीमन, उन्होंने विषय पर दुबारा विचार करने के लिए एक संशोधन पेश किया है। मैं एक मुद्दा उठा रहा हूँ कि इस पर दुबारा विचार नहीं किया जा सकता।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह फैसला सभापति करेंगे कि आप सही हैं

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या वह सही हैं।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : यहाँ एक दूसरा विषय है जिसकी ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। प्रविष्टि संख्या 88क के संशोधन के बारे में यह ठीक वैसा ही संशोधन है जैसा श्री झुंझुनूवाला का है। इसे प्रारूपण समिति ने चुरा लिया है और अपना बता कर पारित कर दिया है। बड़ा आश्चर्य है, डॉ. अम्बेडकर का संशोधन संख्या 379 जो चोरी से संबंधित भारतीय दण्ड संहिता की धारा है। क्या इस प्रकार की साहित्यिक चोरी की अनुज्ञा दी जा सकती है?

माननीय सभापति : इसका संकेत करने का लाभ आप ले सकते हैं।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह उससे पूर्णतः संतुष्ट हैं। उन्होंने चोरी या

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डकैती की शिकायत नहीं लिखाई है।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : लेकिन चोरी संज्ञेय अपराध हैं यह अशोभमनीय भी है। यह किसी की शिकायत पर आधारित नहीं होता एतराज की कमी इसे माफ नहीं करेगी।

माननीय सभापति : हम पहले प्रविष्टियों पर कार्य करेंगे।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, जब यह विषय सदन के सामने

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पिछली बार उठा था तो इस पर जो ठीक-ठीक आवश्यकता थी काफी बहस हुई जो सदन कर सकता था और जिसे स्वीकार करने के लिए मैं तैयार था। आपने भी दया पूर्वक कहा था कि विषय प्रारूपण समिति को सौंप दिया जाएँ। प्रारूपण सिमति उस पर विचार करने के पश्चात् नया प्रस्ताव लाई। प्रस्ताव है कि समाचार पत्र और समाचार पत्रों के विज्ञापन सूची में रख दिए जाए। यह वह विषय है जिस पर प्रारूपण समिति अब सहमत है। दूसरा संशोधन संख्या 379 केवल अनुवर्ती बात है। क्योंकि जब से समाचार पत्र और विज्ञापनों की बिक्री पर कर सूची 1 में लाए जा चुके हैं, बिक्री कर अधिनियम के अधीन समाचार पत्रों उनमें विज्ञापनों पर कराधान को राज्य विधानमंडल के अधिकार क्षेत्र से बाहर न करना आवश्यक है।

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