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प्रविष्टि 58
* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, मेरे मित्र श्री सिधवा ने जो कुछ कहा
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है उस दृष्टि से मैं इन प्रविष्टियों के विषय में अपने दृष्टिकोण में असंगत रहा हूँ। मैं एक या दो निरूपण अपने स्पष्टीकरण द्वारा प्रस्तुत करना चाहूँगा। श्रीमन, मैंने पिछली बार बहस में जो इस विषय पर हुई थी कहा था कि समाचार पत्र अनुच्छेद 13 से बहुत निकट से सम्बद्ध है जिसका संबंध मूल अधिकारों से है। इसलिए समाचार पत्रों के बारे में कोई उपबंध करते समय यह विषय मस्तिष्क में रखना होगा।
दूसरी बात यह है कि जहाँ तक मूल अधिकारों का कोई विनियम संविधान के अनुच्छेद 27 से जिसे हमने पहले ही पारित कर दिया है; संबंधित है वहाँ मूल अधिकारों के बारे में विधान के सभी विषय संसद पर छोड़ दिए हैं और राज्य के पास कोई शक्ति नहीं छोड़ी है। इसलिए मुझे और प्रारूपण समिति को भी दिखाई दिया कि इन विचारों के द्वारा जैसे कि समाचार पत्र मूल अधिकारों में आ रहे थे और मूल अधिकारों से संबंधित सभी विनियम संसद पर छोड़ दिए थे अतः नैसर्गिक न्याय यह है कि कर के उद्देश्य से समाचार पत्र केंद्र के अधिकार में आने चाहिएं।
तीसरा विचार जो प्रारूपण समिति तथा मेरे ऊपर प्रभावी था वह यह था कि इस तथ्य की दृष्टि से कि समाचार पत्रों का संबंध मूल अधिकारों से है जैसे अपनी अभिव्यक्ति और विचार की स्वतंत्रता यह वांछनीय था कि कोई कर जो इन पर लगाया जाए समान हो, एक राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न न हो। ऐसी कई एकरूपता उस समय प्राप्त की जा सकती है जब यह विषय कानून बनाने के लिए संसद पर छोड़ दिया जाए। मुझ पर तथा प्रारूपण समिति पर ये तीन बातें उसके द्वारा अपनाए गए मत में अभिभावी दूसरी महत्वपूर्ण विचारणा थी कि यह मद एकमात्र विधि बनाने के बारे में विशुद्ध मद नहीं थी, यह मद दूसरी सूची की प्रविष्टि 58 में माल शब्द में समाचार पत्र सम्मिलित होने से संबंधित है। इसलिए हमने सोचा कि राज्यों को उस आमदनी से वंचित न किया वंचित जाए जिसे वह समाचार पत्रों पर बिक्री कर अधिनियम के अधीन लगाने के योग्य कर से प्राप्त कर सकते हैं। उचित था कि समाचार पत्रों पर लगाने वाला बिक्री कर अनुच्छेद 250 में सम्मिलित कर लिया जाए जिसमें बहुत सी अन्य मद सम्मिलित हैं और उपबंध करता है कि यदि उन पर कोई कर लगाया गया तो प्राप्ति विभिन्न राज्यों में वितरित होगी।
इसलिए विचार के लिए जो प्रश्न उत्पन्न होता है इसे सूची II से सूची I में स्थानांतरित करने से मानो हम प्रांतों के वित्त की हानि पहुंचा रहे हैं। मेरा उत्तर
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 9 सितम्बर, 1949, पृ. 1182-1183