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332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अन्य धनराशियाँ एकमुश्त कर दी हैं जो राज्य द्वारा प्राप्त की गई थीं लेकिन वे करों अथवा ऋणों के आगम नहीं थे इत्यादि, परिणामस्वरूप दूसरे ढंग से राज्य द्वारा प्राप्त लोक धन जो राजस्व अथवा ऋणों का भाग रूप नहीं विनियोग अधिनियम के अधीन जैसे अर्थात् अनुच्छेद 248-क के उपखण्ड (3) के उपबंध के है अधीन थी। स्पष्टतः उस धन का निकालना जो राज्य संचित निधि का भाग नहीं है। किसी भी विनियोग अधिनियम का भाग नहीं है। वे इस प्रकार निकालने के लिए ऐसे उद्देश्यों और ऐसे समय पर ऐसी बातों के अधीन जो इस संबंध में संसद द्वारा खासतौर से बनाई जाएंगी,

खुले छोड़ दिए जाएंगे। इसलिए संचित निधि की परिभाषा को स्पष्टतः बढ़ाना है और संचित निधि को दूसरी निधि से पृथक करना है जो लोक लेखा में आवश्यक तौर से जाता है जिससे ये परिवर्तन किए गए हैं। इन परिवर्तनों का कोई अन्य उद्देश्य नहीं है। वित्त मंत्रालय ने इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया कि विनियोग अधिनियम के प्रति हमारा उपबंध दूसरे धनों पर लागू किया गया जो साधारणतः लोक लेखा में गया कि जो कठिनाई उत्पन्न करने वाला था। इन कठिनाइयों को दूर करना ठीक है कि ये उपबंध मूल उपबंध में किए गये हैं।

(प्रस्ताव स्वीकार किया गया। नया अनुच्छेद 263क संविधान में जोड़ा गया।)

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प्रिवी कौंसिल की अधिकारिता का उत्सादन अधिनियम

* माननीय सभापति : आज आदेश पत्र पर प्रथम धारा डॉ. अम्बेडकर के प्रस्ताव की सूचना एक अधिनियम सम्राट के सपरिषद अधिकार क्षेत्र को समाप्त करने के संबध में है।

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सपरिषद अधिकार क्षेत्र को समाप्त करने के लिए एक अधिनियम अपील और अर्जी पेश करने के बारे में है।

माननीय सभापति : प्रश्न है : ’भारतीय अपीलों और अर्जियों की बाबत सम्राट की सपरिषद अधिकारिता समाप्त करने के लिए विधेयक पुरःस्थापित करने की इजाजत दी जाए।’

(प्रस्ताव स्वीकार किया गया।)

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, मैं विधेयक पुरःस्थापित करता हूँ।

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* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 14 सितम्बर, 1949, पृ. 1415