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करूं कि संघ सूची के विषयों के बारे में उच्चतम न्यायालय के पास ऐसे और भी क्षेत्र और शक्तियां होंगी। वह इस प्रकार हैं :
114 (1). संघ सूची के विषयों में से किसी के बारे में उच्चतम न्यायालय को ऐसी और अधिकारिता और शक्तियां होंगी जैसी संसद विधि द्वारा प्रदान करे।
यदि संसद सोचती है कि इस प्रकार की शक्तियाँ उच्चतम न्यायालय के पास हों तो संसद के मार्ग में एक उचित उपबंध सेना अधिनियम में बनाकर ऐसी शक्तियां उनको देने में कोई बाधा नहीं है।
मैं अनुच्छेद 112 की ओर दुबारा ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा जो विशेष आवश्यकताओं के विषय में है। उसके अधीन उच्चतम न्यायालय सेना न्यायालय के विरुद्ध अपील सुनने के लिए स्वतंत्र होगा क्योंकि वहाँ प्रयुक्त किए गए शब्द इस प्रकार हैंः
“किसी न्यायालय अथवा प्राधिकरण द्वारा बनाया गया कोई मुकदमा या मामला।“ और इसलिए शब्द इतने व्यापक होने से न्यायालय और प्राधिकरण अनुच्छेद 112 की व्यवस्थानुसार उच्चतम न्यायालय के विशेष क्षेत्र से नहीं बच सकेगा। इसलिए मेरा निवेदन है कि उनका संशोधन भी बिल्कुल अनावश्यक है।
जहाँ तक मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद के संशोधन का संबंध है जो ’मौजूद कानून’ शब्दों को लुप्त करने के बारे में है......
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मैंने वह पेश नहीं किया है।
माननीय सभापति : उन्होंने इसे पेश नहीं किया है। उन्होंने इसे प्रारूपण समिति के लिए छोड़ दिया है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, यदि उन्होंने मसौदा समिति को छोड़
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दिया है तो मैं बहुत प्रसन्न हूँ। उनके मुद्दे पर हम विशेष ध्यान देंगे।
माननीय सभापति : तब मैं संशोधन रखूँगा।
प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना : दिए गए विश्वासों की दृष्टि से मैं अपने संशोधन वापिस लेना पसंद करूँगा।
पंडित ठाकुरदास भार्गव : श्रीमन, मैं भी अपना संशोधन वापिस ले रहा हूँ।
(सभा समाप्त होते-होते संशोधन वापिस ले लिए गए।)
(अनुच्छेद 112-ख संविधान में जोड़ा गया।)