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(4) संसद विधि द्वारा विहित कर सकेगी कि “किन परिस्थितियों के अधीन और किस वर्ग या वर्गों के मामलों में किसी व्यक्ति को निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन तीन मास से अधिक के लिए निरुद्ध किया जा सकेगा।“
श्रीमन, सदन को याद होगा कि जब इस सभा के पिछले सत्र में हम अनुच्छेद 15 पर विचार कर रहे थे, तब इस विषय पर बहुत वाद-विवाद हुआ था कि ’विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार न कि अन्यथा’ शब्द होने चाहिएं अथवा ’सम्यक प्रक्रिया’ शब्द अनुच्छेद 15 के शब्दों के स्थान पर होने चाहिएं। आखिरकार, यह स्वीकार किया गया था कि ’सम्यक प्रक्रिया’ शब्दों के स्थान पर ’विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार’ होने चाहिएं। मैं जानता हूँ कि मेरे सहित सदन का एक बड़ा भाग अनुच्छेद 15 के शब्दों से बहुत असंतुष्ट था। यह भी याद होगा कि हमारे मसौदा संविधान का ऐसा कोई भाग नहीं है जिसकी जनता द्वारा कड़ी आलोचना अनुच्छेद 15 की भांति हुई हो, क्योंकि अनुच्छेद 15 जो करता है वह कार्यपालिका को बंदी बनाने से रोकता है। यह सब एक कानून के लिए है और विधि किसी परिस्थिति तथा सीमा के अधीन नहीं है। दूसरे शब्दों में, यह महसूस किया गया था कि मूल अधिकारों के बारे में जब इस अध्याय में यह विषय सम्मिलित किया गया था, तब हम संसद को, जैसा वह ठीक समझे, किन्हीं हालात के अधीन किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए कानून बनाने और व्यवस्था करने की संपूर्ण शक्तियाँ दे रहे थे। इसलिए अब हम अनुच्छेद 15-क पेश करके, यदि मैं ऐसा कहना चाहूँ तब अनुच्छेद 15 पारित करके जो उस समय किया गया था दूसरे शब्दों में, अनुच्छेद 15-क पुरःस्थापित ’सम्यक प्रक्रिया’ के कानून के सार का उपबंध कर रहे हैं।
अनुच्छेद 15-क दण्ड प्रक्रिया संहिता के उपबंधों से मात्र दो अत्यंत मूलभूत सिद्धांतों को ग्रहण करता है जिसे प्रत्येक सभा देश अंतर्राष्ट्रीय न्याय के सिद्धांत के रूप में अपनाता है। यह बिल्कुल सही है कि खंड (1) और (2) के दो उपबंध पहले से ही दण्ड प्रक्रिया संहिता में हैं और इसीलिए कदाचित यह कहा जाना चाहिए था कि हम कोई बहुत मौलिक बदलाव नहीं कर रहे हैं। लेकिन जैसा मैंने व्यक्त किया हम मौलिक बदलाव कर रहे हैं क्योंकि जो कुछ हम अनुच्छेद 15-क पुरःस्थापित करके कर रहे हैं वह संसद व प्रांतीय विधानमंडल के अधिकारों पर इन दो उपबंधों को न हटाने के लिए रोक लगा रहे हैं, क्योंकि यह अब हमारे संविधान में समाविष्ट हो गए हैं।
यह बिल्कुल सच है कि खंड (1) तथा (2) के उपबंधों से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए उत्साही लोग कदाचित संतुष्ट नहीं हैं। कदाचित वह नागरिक की व्यक्तिगत