338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
स्वतंत्रता के लिए कार्यपालिका तथा विधानमंडल के अतिक्रमण के विरुद्ध कुछ और अधिक रक्षोपाय चाहते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मैं सोचता हूँ कि जब मुझे उनसे सहानुभूति है कि कदाचित अनुच्छेद कुछ अधिक रक्षोपाय के लिए विस्तृत कर दिया गया है, मुझे पूर्ण संतोष है कि गैर-कानूनी अथवा मनमानी गिरफ्तारियों के विरुद्ध अंतर्विष्ट उपबंध पर्याप्त हैं।
जैसाकि सदस्यगण देखेंगे अनुच्छेद 15क के खंड (1) और (2) के उपबंध कुछ सीमाओं के अधीन रखे गए हैं जो खंड (3) में वर्णित हैं जो कहते हैं अनुच्छेद 15-क के खंड (1) व (2) के उपबंध उस किसी व्यक्ति पर लागू नहीं होंगे जो दुश्मन देश का व्यक्ति है। मैं नहीं समझता कि विदेशी शत्रु के खंड (3)(क) में रखे गए आरक्षण के लिए किसी को एतराज होगा।
खंड (3) के उपखंड (ख) के बारे में मैं सोचता हूँ कि इसे मान्यता मिलनी ही है कि देश की वर्तमान परिस्थितियों में कार्यपालिका के लिए उस व्यक्ति को बंदी बनाना आवश्यक होगा जो समवर्ती सूची के सार्वजनिक आदेशों अथवा देश की रक्षा सेवा से छेड़छाड़ कर रहा है। ऐसे किसी मामले में मैं नहीं समझता कि व्यक्ति की स्वतंत्रता की आवश्यकता देश के लाभ के ऊपर रखी जाए। यह उस आधार पर है जिससे खंड (3) के उपबंधों में उपखंड (2) पेश किया जा चुका है।
पुनः जो व्यक्ति की पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं यह मानेंगे कि निवारक निरोध की यह शक्ति दो परिसीमाओं में रखी गई है : एक यह है कि सरकार के पास खंड (3) के उपबंध के अधीन केवल तीन माह के लिए किसी व्यक्ति को कैद करके रखने की शक्ति होगी। यदि वे उसे तीन माह से अधिक के लिए बंदी बनाए रखना चाहते हैं तो उनके पास सलाहकार बोर्ड की एक सूचना होनी चाहिए जो कार्यपालिका द्वारा दिए गए कागजों की जांच करेंगे और कदाचित एक अवसर अभियुक्त को अपना पक्ष कथन प्रतिवेदित करने का देंगे और यह विनिश्चय करेंगे कि निरोध न्यायोचित है। यह केवल इस बात के अधीन है कि कार्यपालिका किसी भी व्यक्ति को तीन माह से अधिक निरुद्ध कर सकेगी। दूसरे, बंदीकरण तीन माह से अधिक के लिए रह सकता है यदि संसद एक सामान्य विधि बना दे कि किस श्रेणी के मामले तीन माह से आगे बढ़ाए जाएंगे और ऐसे निरोध की अवधि बता दे।
मैं सोचता हूँ, पूर्णतौर पर जो व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं उन्हें अपने आप को धन्यवाद देना चाहिए कि इस खंड को पुरःस्थापित करना संभव पाया गया है जो यद्यपि उन्हें संतुष्ट न कर पाए जिनके विचार इस मामले में पूर्ण निश्चय तौर पर बहुत बड़ी मात्रा में रक्षा करता है जिसे ’विधि की सम्यक प्रक्रिया’