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के लिए और आसपास के मजिस्ट्रेट द्वारा उसके बारे में कार्यवाही करने के लिए पूर्णतम अवसर देंगे अथवा क्या हम वर्ग I मजिस्ट्रेट की तलाश में लगाए जायेंं। मैं सोचता हूँ कि अभियुक्त की स्वतंत्रता के हित में ’निकटतम मजिस्ट्रेट’ का उपबंध सबसे अच्छा है। मुझे अपने मित्र पाटसकर को यह भी बता देना चाहिए कि यद्यपि हमने संशोधन ’निकटतम वर्ग I मजिस्ट्रेट’ स्वीकार कर लिया होता लेकिन आज की सरकार के लिए मजिस्ट्रेट की शक्तियां देने के लिए वर्ग I मजिस्ट्रेट की शक्तियां जिस मजिस्ट्रेट को देना चाहते हैं उसे देना पूर्णतः संभव होता और उससे अभियुक्त के साथ छल हो जाता। इसलिए मैं नहीं सोचता कि उसका संशोधन या वांछनीय तो है अथवा आवश्यक और मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता।
और अब अनुच्छेद 15-क में जो उपबंध रखे हैं वे साधारण उपबंध हैं और मुझे विश्वास है....
पंडित ठाकुरदास भार्गव : कृपया विचार कीजिए।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : अब मेरे मित्र पं. ठाकुरदास भार्गव ने प्रति
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परीक्षा का प्रश्न उठाया है।
पंडित ठाकुरदास भार्गव : और लेखबद्ध कारणों से.....
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : अच्छा, मैं सोचता हूँ कि वह आज्ञापक उपबंध
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है, क्योंकि मैं सोचता हूँ कि उपबंध जो बहुत से दण्ड प्रक्रिया संहिता के उपबधों में मजिस्ट्रेट पर इसे लेखबद्ध कारणों से आवश्यक बनाना उच्च न्यायालय को समर्थ बनाता है कि मजिस्ट्रेट पर छोड़ा गया विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायिक तौर पर किया गया है। मैं बिल्कुल सहमत हूँ कि यह बहुत आज्ञापक उपबंध है लेकिन मैं वास्तव में चाहता हूँ कि मेरे मित्र विचार करें कि इस प्रकार के मामले में जिसमें कहाँ, क्या फंसा है और आगे अवधि के लिए अभिरक्षा में भेजना अंतग्रहित है। मजिस्ट्रेट के पास यह सोचने का अधिकार नहीं होगा कि क्या पुलिस के द्वारा अभियुक्त के विरुद्ध लगाया गया आरोप पहली दृष्टि में सिद्ध होता है।
पंडित ठाकुरदास भार्गव : इस समय भी धारा 167(3) में ये शब्द मौजूद हैं। आज भी प्रत्येक मजिस्ट्रेट का जिसके पास कोई व्यक्ति ले जाए, यह कर्तव्य है कि यदि वह निरोध जारी रखने की आज्ञा देता है, तो वह उसके कारण लेखबद्ध करे।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह बिल्कुल सत्य है वे हैं लेकिन क्या वे
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बहुत आवश्यक हैं?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं व्यक्तिगत तौर पर नहीं समझता कि वे
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आवश्यक हैं। आइए, हम सबसे खराब मामला लें। पुलिस को प्रसन्न करने के लिए