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श्रीमन, अधिकतम सजा के प्रश्न को बढ़ा दिया गया है। जो चाहते हैं कि अधिकतम सजा निश्चित कर दी जाए, खंड (4) के उपबंध को कृपया नोट करें जहाँ निश्चित तौर पर यह कहा गया है कि ऐसा विधि बनाने में संसद भी अधिकतम समय निश्चित करेगी। पंडित हृदयनाथ कुंजरू : शब्द ’सकेगी’ है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : ’बना सकेगी’ ’बनाएगी’ है।
पंडित हृदयनाथ कुंजरू : संसद वह कर सकेगी अथवा नहीं कर सकेगी।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : वह सच है, लेकिन यदि यह करता है, वह अधिकतम निश्चित करेगी।
उठाया गया दूसरा प्रश्न गिरफ्तार किए गए व्यक्ति और उसके परिवार के बारे में है।
श्री जसपतराय कपूर : समसामयिक प्रकाशित लेखों के बारे में क्या है?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं उस पर आ रहा हूँ। वह ऐसा मामला नहीं
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है जिसे हम संविधान में समाविष्ट कर सकें। उदाहरण के लिए, कुछ मामलों में यह आवश्यक होगा और दूसरे मामलों में नहीं होगा। इसके अतिरिक्त, खंड (4) संसद को भी यह शक्ति देता है कि वह गुजारा भत्ता दिया जाएगा। व्यक्तिगत तौर पर, मैं स्वयं सोचता हूँ कि निर्वाह के पक्ष में तर्क बहुत कमजोर है। एक आदमी वास्तव में राज्य की जड़ खोद रहा है और उसे उस कार्य के लिए गिरफ्तार कर लिया गया है तो जब वह कारागार में है भोजन का अधिकार है लेकिन उसे निर्वाह की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है। तो भी उदाहरण के रूप में संसद और विधानमंडल को उपबंध बनाने चाहिएं। मैं समझता हूँ कि ऐसा उपबंध किसी भी अधिनियम में संभव है जिसे संसद खंड (1) के अधीन बना सकेगी।
बंदी के मामलों पर पुनर्विलोकन के बारे में, मुझे फिर भी कुछ दिखाई नहीं देता कि प्रांतीय सरकारों को उनकी अपनी विधि के अधीन आवधिक पुनर्विलोकन के लिए उपबंध बनाना अथवा संसद के लिए खंड (4) के अधीन कानून बनाकर आवधिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था करना क्यों संभव नहीं होना चाहिए? मैं समझता हूँ यह शुद्ध प्रशासनिक मामला है और कानून के द्वारा विनियमित किया जा सकता है।
मेरे मित्र श्री अनंतशयनम अयंगर ने कहा था कि मैं वास्तव में बंदी के लिए बहुत भावना नहीं रखता क्योंकि मैं कभी जेल में नहीं रहा, लेकिन मैं उनको बता सकता हूँ कि गत मंत्रिमण्डल में पुनर्विलोकन के नियम के समावेश के लिए यदि कोई व्यक्ति जिम्मेवार था तो मैं था। मंत्रिमंडल का एक बड़ा भाग इसके विरुद्ध था।