अधीनस्थ न्यायालय - Page 378

357

अधीनस्थ न्यायालयों पर 209ख. जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की राज्य की अधीनस्थ न्यायालयों पर

नियंत्रण न्यायिक सेवा में नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा नियंत्रण

आयोग तथा ऐसे राज्य के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग

करने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात् उसके द्वारा इस निमित्त बनाए गए नियमां के अनुसार की जाएगी।

209-ग. जिला न्यायाधीश के पद से निचले किसी पद को धारण करने वाले राज्य की न्यायिक सेवा के व्यक्तियों की पद स्थापना, पदोन्नति और छुट्टी देने सहित जिला न्यायालयों तथा उनके अधीनस्थ न्यायालयों का नियंत्रण उच्च न्यायालयों में निहित होगा। किन्तु इस अनुच्छेद की किसी बात का यह अर्थ नहीं किया जाएगा कि मानों वह ऐसे किसी व्यक्ति से उस अपील के अधिकार को छीनती है जो कि उसकी सेवा की शर्तों का विनियमन करने वाली विधि के अधीन उसे प्राप्त है अथवा उच्च न्यायालय को अधिकार देती है कि वह उसकी सेवा की ऐसी विधि के अधीन विहित शर्तों के अनुसरण से अन्यथा उसे निपटे।“

सर्वचयन 209-घ. (1) इस अध्याय में : सर्वचयन 209-घ. (1)

(क) ’जिला न्यायाधीश’ पद के अंतर्गत नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश,

अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला

न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसीडेन्सी

मजिस्ट्रेट, अपर मुख्य प्रेसीडेन्सी मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायाधीश, अपर सेशन

न्यायाधीश और सहायक सेशन न्यायाधीश भी हैं।

(ख) ’न्यायिक सेवा’ पद से ऐसी सेवा अभिप्रेत है, जो केवल ऐसे व्यक्तियों

से मिलकर बनी है, जो जिला न्यायाधीश के पद तथा सिविल व्यवहार

न्यायालय पदों को भरने के लिए आशायित है।’

कुछ प्रकार या प्रकारों 209-च. राज्यपाल सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा निदेश दे के मजिस्ट्रेटों पर इस सकेगा कि इस अध्याय के पूर्वगामी उपबंध तथा उनके कुछ प्रकार या प्रकारों के मजिस्ट्रेटों पर इस

अध्याय के उपबंधों का अधीन बनाये गए कोई नियम ऐसी तारीख से जो कि वह अध्याय के उपबंधों का

लागू होना उस बारे में नियत करे, राज्य के किसी वर्ग या वर्गों के लागू होना

मजिस्ट्रेटों के संबंध में ऐसे अपवादों और उपांतरों के अधीन जो अधिसूचना में उल्लिखित हों, वैसे ही लागू होंगे जैसे कि वे राज्य की अधीनस्थ सेवा में नियुक्त व्यक्तियों के संबंध में लागू होते हैं।

श्रीमन, इन उपबंधों के दो उद्देश्य हैं। सर्वप्रथम, जिला न्यायाधीश और अधीनस्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनकी अर्हताओं के बारे में उपबंध करना। दूसरा उद्देश्य है संपूर्ण सिविल न्यायपालिका को उच्च न्यायालय के नियंत्रण के अधीन रखना।