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करने का अधिकार प्रदान किया था। जैसा कि वर्तमान उपबंध में है विधेयक को लौटाने का मामला राज्यपाल के स्व-निर्णय पर छोड़ दिया गया। दूसरे, सिफारिश के साथ विधेयक को लौटाने का अधिकार सभी विधेयकों पर लागू होता है इसमें वित्तीय विधेयक भी शमिल है। तीसरे, राज्यपाल को विधयेकों को लौटाने का यह अधिकार केवल उन्हीं परिस्थितयों में दिया गया है जहाँ कि राज्य की विधानपालिका एक सदन वाली है। तब यह महसूस किया गया था कि जिम्मेदार सरकार में राज्यपाल के लिए स्व-निर्णय से कार्य करने की कोई गुंजाइश नहीं होगी। इसलिए नये उपबंध में ‘उसके स्व-निर्णय परा शब्दों को निकाल दिया गया है। इसी तरह यह महसूस किया जाता है कि विधेयक को लौटाने का यह अधिकार वित्तीय विधेयक तक नहीं बढ़ाना चाहिए। परिणामस्वरूप ’यदि यह वित्तीय विधेयक नहीं है’ शब्दों को सम्मिलित किया गया है। यह भी महसूस किया गया कि विधानपालिका को राज्यपाल का विधेयक लौटाने का यह अधिकार उन परिस्थितियों तक आवश्यक रूप से सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है जहाँ कि राज्य में विधानपालिका एक सदन वाली है। यह एक हितकारी उपबंध है जिसका सभी परिस्थितियों में प्रयोग किया जा सकता है वहाँ भी, जहाँ कि राज्यों में विधानपिलका दो सदन वाली है।
यह इन तीन बदलावों की व्यवस्था करने के स्थान पर है कि पुराने उपबंध के लिए नये उपबंध को प्रतिस्थापित किया जाए और मैं आशा करता हूँ कि सदन इसे स्वीकार कर लेगा।
माननीय सभापति : मेरे ध्यान में कुछ संशोधन हैं जो कि पूरक सूची में छपे हैं। क्या कोई सदस्य उनमें से किसी संशोधन का प्रस्ताव करना चाहता है। ये संशोधन श्री सतीश चन्द्र, श्री बी. एन. गुप्ते और प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना के नाम पर हैं।
[ संशोधन प्रस्तावित नहीं किए गये। ]
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* माननीय सभापति : परसों उठने से पहले हम अनुच्छेद 175 पर विचार कर रहे थे। अब हम अनुच्छेद 175 पर चर्चा जारी रखेंगे.......
श्री टी.टी. कृष्णमाचारी (मद्रास : जनरल) : महोदय, क्या मैं निवेदन कर सकता
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हूँ कि उस अनुच्छेद का अनुच्छेद 172 से बहुत कम संबंध है। ... मैं सुझाव देता हूँ कि अनुच्छेद 175 को अनुच्छेद 172 से अलग समझा जाए।
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, 1 अगस्त, 1949, पृ. 43