359
भाग III में राज्यों से संबंधित उस भाग में पिरोने की कोशिश अंतिम स्तर पर विशेष प्रकार से अपना कर करेंगे।
यहाँ दो संशोधन हैं - पहला श्री चाल्हिया द्वारा और दूसरा पंडित कुंजरू द्वारा जो कुछ स्पष्टीकरण चाहते हैं।
श्री चाल्हिया द्वारा पेश किए गए संशोधन के बारे में मुझे कहते हुए दुःख होता है कि मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता जिसके दो कारण हैं : एक यह कि जैसा वह अपने संशोधन के द्वारा चाहते हैं, हम विधि द्वारा किसी प्रकार की प्रांतीयता प्रविष्ट करना नहीं चाहते। दूसरे, इसके संशोधन को स्वीकार करना प्रांत के लिए कठिनाई पैदा कर सकता है क्यांकि ऐसा वकील ढूंढना संभव नहीं हो सकता जो तकनीकी तौर पर योग्यता रखता हो लेकिन सारतः उच्च न्यायालय की नियुक्ति के योग्य न हो और मैं सोचता हूँ कि अधिकारियों के लिए ऐसी नियुक्तियों के लिए आधार पूर्णतः
खुले छोड़ देना अधिक अच्छा होगा बशर्ते कि प्रार्थी योग्यताएँ रखता हो। इसलिए मैं उस संशोधन को स्वीकार नहीं कर सकता।
मेरे मित्र पंडित कुंजरू का संशोधन मेरे विचार में एक बहुत छोटा मुद्दा उठाता है और वह मुद्दा यह है : क्या जिला न्यायाधीश की तैनाती और पदोन्नति राज्यपाल के पास होनी चाहिए? अर्थात् आज की सरकार अथवा 209-ग तक स्थानांतरित होना चाहिए उच्च न्यायालय तक? अब उपबंध जैसा भारत शासन अधिनियम, 1935 में यह था कि जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, तैनाती और पदोन्नति पूरी तरह राज्यपाल के हाथ में थी। जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, तैनाती और पदोन्नति के बारे में उच्च न्यायालय को कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। मेरे मित्र श्री कुंजरू देखेंगे कि हमने भारत शासन अधिनियम के उपबंध को उचित रूप से उधार लिया है, क्योंकि हमने एक शर्त जोड़ दी है जैसे कि जिला न्यायाधीश तैनाती, नियुक्ति और पदोन्नति के मामले में उच्च न्यायालय से सलाह ली जाएगी। इसलिए अंतर यह है कि क्या उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र केवल वह होगा जो हम तैनाती, पदोन्नति और छुट्टी इत्यादि के मामले में देने का प्रस्ताव करते हैं। जिला न्यायाधीश को छोड़ कर अधीनस्थ न्यायिक सेवा अथवा सभी अधीनस्थ न्यायाधीशों सहित जिला न्यायाधीशों के इन सभी मामलों में उच्च न्यायालय अधिकार क्षेत्र रखेगा। मुझे यह दिखाई देता है कि हमने जो राजीनामा किया है वह गौरवयुक्त है। आखिरकार अंतर केवल यह होगा कि अधीनस्थ न्यायाधीशों की तैनाती, पदोन्नति तथा छुट्टियों की स्वीकृति के बारे में विज्ञप्ति उच्च न्यायालय से जारी होगी, जबकि जिला न्यायाधीशों के मामले में ऐसी विज्ञप्ति सचिवालय से जारी होगी। मौलिक व सारवान बिल्कुल भी अंतर नहीं है जिला न्यायाधीशों को उच्च न्यायालय का संरक्षण प्राप्त होगा क्योंकि यह