अनुच्छेद 215 - Page 381

360 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शर्त आवश्यक बना दी गई है और मेरे विचार से वह समय की आवश्यकता की पूर्ति करेगी।

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अनुच्छेद 215

* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, मुझे कुछ भी नही कहना है।

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सरदार हुक्म सिंह : श्रीमन, पेश करने के लिए मेरे पास कोई संशोधन नहीं है। इस अनुच्छेद के खंड (2) का एक एतराज मेरे पास है जिसकी ओर मैं प्रारूपण समिति के अध्यक्ष का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। पदावली मुझे संसद की प्रभुसत्ता का अपमान करने वाली प्रतीत होती है और मैं उनसे, यदि संभव हो, शब्द बदलने के लिए निवेदन करूँगा।

......मैं इसे प्रारूपण समिति के अध्यक्ष की जानकारी में लाना चाहता हूँ।

माननीय सभापति : पैरा 2 के संबंध में सरदार हुक्म सिंह ने कुछ सुझाव दिए हैं वह कहते हैं कि यह कहना कि संसद द्वारा बनायी किसी विधि को राष्ट्रपति निरस्त अथवा संशोधित कर सकता है, संसद का अपमान करना है और शब्दों को इस प्रकार उपांतरित किया जाए जिससे यह पता चले कि संसद की शक्ति किसी प्रकार अधीनस्थ नहीं हुई है।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : वह ऐसा है। यह एक प्रकार का अनुकलन है। असम के स्वशासी जिलों के लिए असम के राज्यपाल को ऐसी ही शक्तियाँ संसद द्वारा बनाई गई विधि को, जहाँ वह उचित समझता है, सुधारने के लिए प्राप्त है। संसद द्वारा बनायी गई सभी विधियाँ अनकूलित किए बिना कुछ खास विशेष प्रकार के क्षेत्र पर लागू नहीं की जा सकती।

सरदार हुकम सिंह : महोदय, क्या यह उत्तर पर्याप्त है? मेरा सुझाव यह था कि यह कहना कि संसद द्वारा पारित अधिनियम का राष्ट्रपति निरसन कर देंगे यह संसद की प्रयुसत्ता का अनादर होगा।

माननीय सभापति : सुझाव एक शब्द के बारे में है न कि शक्ति के बारे में?

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 16 सितम्बर, 1949, पृ. 1582