20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सदन को याद होगा कि जब हमने लोकसभा तथा राज्यसभा के बीच मतभेदों को हल करने के प्रश्न पर चर्चा की थी तब हमने ऐसे विभिन्न तरीकों का जिक्र किया था जिसके द्वारा ऐसे मतभेदों को हल किया जा सकेगा, और हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि केन्द्रीय विधानपालिका के संघीय चरित्र को ध्यान में रखते हुए यह उचित होगा कि दोनों सदनों के बीच के मतभेदों को राष्ट्रपति द्वारा इस उद्देश्य के लिए बुलाये गये दोनों सदनों के संयुक्त सत्र में हल कर लेना चाहिए। उस समय यह सुझाव दिया गया था कि संयुक्त सत्र की प्रक्रिया को अपनाने के स्थान पर 1911 को संसद अधिनियम में बताई गई प्रक्रिया को अपनाना चाहिए जिसमें कि हाउस ऑफ कामन्स का किसी विशेष विधेयक जो कि वित्तीय विधेयक नहीं है के सम्बन्ध में निर्णय अन्तिम विश्लेषण में हावी रहता है जब एक निश्चित समय बीत जाने के बाद हाउस ऑफ कामन्स द्वारा सुझाये गये संशोधनों से हाउस ऑफ लार्ड्स सहमत होने में असफल रहा है या उसने सहमत होने से इंकार कर दिया है। इस मामले पर विचार करने पर, यह महसूस किया गया कि राज्य में बनाये गये दोनों सदनों के बीच के मतभेदों को हल करने के लिए संसद अधिनियम में दोंनों सदनों के बीच के मतभेदों को हल करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया अधिक उपयुक्त है। फलतः हम मूल अनुच्छेद से हट गये हैं और नया अनुच्छेद सन्निविष्ट कर रहे हैं जिसमें यह प्रस्ताव है कि उन मतभेदों जिन्हें दोनों सदन आपसी सहमति से हल नहीं कर सके हैं की स्थिति में अधिक लोकप्रिय सदन जो समूची जनता का प्रतिनिधित्व करता है का निर्णय मान्य होना चाहिए।
महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ।
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* पंडित हृदयनाथ कुॅजरू : ...... प्रारूपण समिति द्वारा समय-समय पर किए गए बदलावों पर विचार करते हुए मैं सोचता हूँ कि यह किसी सिद्धांत पर कार्य नहीं कर रही। मेरे माननीय मित्र डा. अम्बेडकर कहते हैं कि वहाँ एक बहुत अच्छा सिद्धांत है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं कहता हूँ वहॉ कोई सिद्धांत नहीं है।
पंडित हृदयनाथ कुॅजरू : मुझे प्रसन्नता है कि मेरे दोस्त ने स्वीकार किया कि संशोधन के पीछे, जो उन्होंने सदन को सुझाया है, कोई सिद्धांत नहीं है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह कार्य साधकता अैर व्यवहारिकता का
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, 1 अगस्त, 1949, पृ. 52