अनुच्छेद 172 - Page 42

21

मामला है।

पंडित हृदयनाथ कुॅजरू : वे स्वीकार करते हैं यह कार्य साधकता तथा व्यवहारिकता

ukFk dWqt

का प्रश्न है.......

* * * *

* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमान अध्यक्ष, महोदय, जैसा कि मैंने बहस

vE csMd j

में सुना, मैं पाता हूॅ कि कुछ बहुत विशेष प्रश्न हैं जिन्हें उन वक्ताओं ने उठाया है जिन्होंने उस बहस में भाग लिया है। पहला प्रश्न मेरे मित्र श्री संथानम द्वारा उठाया गया था और पहले मैं उसे निपटाना चाहूँगा इससे पहले कि मैं अैर प्रश्नों पर गौर करूं। श्री संथानम ने कहा कि इस अनुच्छेद की धारा (1) में ऐसी स्थिति के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए जहाँ कि ऊपरी सदन ने विधेयक उस रूप में पारित नहीं किया है जिसमें कि विधानसभा ने पारित किया था। मै। सोचता हूँ कि आगे विचार करने पर, वे पायेंगे कि उनका सुझाव वास्तव में उपखण्ड (स) में सम्मलित है यद्यपि इसके शब्द अलग हैं। वास्तव में हमने ऐसी तीन स्थितियों के लिए व्यवस्था की है जिनके घटित होने पर निचले सदन को अपने स्वयं के प्राधिकार पर कार्य करने के लिए न्यायिक अधिकार प्राप्त होगा। वे तीन स्थितियाँ हैं :-पहली, जब विधेयक पर

विचार किया जाता है लेकिन उसे पूर्णतः अस्वीकार कर दिया जाता है; दूसरी जब ऊपरी सदन या तो निष्क्रिय बैठा है और उस पर कोई कार्यवाही नहीं कर रहा या फिर विधेयक पर विचार करने हेतु कार्यवाही करने के लिए उसे जितना समय दिया गया था उससे कहीं ज्यादा देर लगा दी है; तथा तीसरे, जब वह सदन विधेयक को उसी रूप में पारित करने के लिए राजी नहीं हुआ जिस रूप में उसे विधानसभा ने पारित किया था उसका व्यवहार में वही अर्थ है जिसका कि मेरे दोस्त श्री संथानम सुझाव दे रहे हैं। इसलिए मैं नहीं समझता कि अनुच्छेद के उस अंश को संशोधित करने की आवश्यकता है। मैं संयोगवश कह सकता हूँ कि इन तीन वर्गों या शर्तों का उत्तरदान करने के लिए जिनके घटने पर निचले सदन के पास अपने प्राधिकार पर कार्यवाही करने का अधिकार होगा ये शब्द लगभग ऑस्ट्रेलिया के संविधान के अनुच्छेद 57 से लिए गए हैं।

अब मैं उन सामान्य प्रश्नों पर आता हूँ जो उठाये गये हैं। इस मामले पर चर्चा करते हुए मुझे यह प्रतीत होता है, तीन भिन्न प्रश्न हैं जो विचारणीय हैं। पहला प्रश्न है कि विधेयक को कितनी बार यात्राएं करनी चाहिएं इससे पहले कि निचले सदन की इच्छा सर्वोपरि हो जाय। क्या इसकी एक यात्रा, दो या दो से अधिक यात्राएं

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, 30 जुलाई, 1949, पृ. 57-59