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करना ही क्या है? किसी उस विधेयक पर कार्यवाही करने में जो निचले सदन द्व ारा ऊपरी सदन को भेजा गया है ऊपरी सदन समूचे विषय का पुनः प्रारूप नहीं बनाने जा रहा है; यह प्रत्येक धारा को बदलने नहीं जा रहा है। यह केवल उन निश्चित धाराओं, जिन्हें यह सार्वजनिक महत्ता की महसूस कर सकता है, पर विचार करना पसन्द करेगा और मुझे सोचना चाहिए कि उस प्रकार की सीमित वैधानिक कार्यवाही के लिए प्रथम दृष्टि में, तीन महीने की अवधि ऊपरी सदन को अनुमत करने के लिए काफी अधिक है और यह निश्चित तौर पर किसी द्वितीय सदन की वैधानिक कार्यवाही को कम नहीं करेगी। दूसरी स्थिति में, हमने महसूस किया कि जब निचले सदन ऊपरी सदन द्वारा सुझाये गये संशोधनों को स्वीकार कर सकते हैं, दूसरी यात्रा के लिए एक महीने का समय भी पर्याप्त है। इसलिए जैसा मैंने कहा कि यहाँ सिद्धांत का कोई प्रश्न न होते हुए लेकिन केवल व्यवहारिक राजनीति का प्रश्न होने पर, हमने सोचा कि तीन महीने और एक महीना पर्याप्त हैं।
अब मैं अंतिम प्रश्न पर आता हूँ उदाहरणार्थ तीन महीने या एक महीने का परिकलन करने के लिए आदि बिंदु क्या होना है। मैं सोचता हूँ कि श्री कुंजरू मुझे यह कहने के लिए क्षमा कर देंगे कि प्रारूपण समिति द्वारा किये गये परिवर्तनों की महत्ता का मूल्यांकन करने में वे असफल रहे हैं। यदि यह व्यवस्था प्रारूप अनुच्छेद 172 जैसा कि वह है, में नहीं की गयी होती तो मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है- और प्रारूपण समिति को भी कोई संदेह नहीं था- कि ऊपरी सदन की शक्तियाँ पूर्णतः नकार दी गई होतीं तथा निष्प्रभावी कर दी गयी होतीं। मुझे उसकी व्याख्या करने दो; लेकिन पहले कि मैं यह करूं, जिसे मैं सीमा निर्धारण का आदि बिन्दु कहता हूँ को तय किए जाने की सम्भावनाओं को करने दो। सर्वप्रथम, यह कहा जाना सम्भव होगा कि ऊपरी सदन को विधेयक उस कथित अवधि के अन्दर अवश्य पारित कर देना चाहिए जब से विधेयक के निचले सदन ने उसे पारित कर दिया था। दूसरे, यह कहा जाना सम्भव होगा कि ऊपरी सदन को विधेयक उस कही गयी अवधि में पारित कर देना चाहिए जब से उस सदन ने विधेयक को प्राप्त किया है। अब यह मानते हुए कि हमने इनमें से किसी एक सम्भावना को अपना लिया है ऊपरी सदन के लिए अनर्थकारी परिणाम होंगे। एक बार आप याद करेंगे कि ऊपरी सदन को बुलाना पूर्णतः कार्यपालिका के हाथ में है - जो कि बुला सकती है जब यह चाहती है और नहीं बुला सकती है जब यह नहीं चाहती है- एक बेईमान कार्यपालिका के लिए यह बिल्कुल सम्भव होगा कि वह इस अनुच्छेद का फायदा ऊपरी सदन का सत्र बिल्कुल भी न बुलाकर उठा सकती है। अथवा यह मानते हुए कि हमने प्राप्ति को आदि बिन्दु के रूप में लिया है वे विधेयक को कार्यसूची में न रखकर ऊपरी सदन को धोखा दे सकते हैं और इस तरह ऊपरी सदन को इस पर विचार करने