अनुच्छेद 172 - Page 45

24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के लिए अवसर प्रदान न करें। हमने सोचा कि इस प्रकार की प्रक्रिया गलत थी; इसका परिणाम ऊपरी सदन को उसकी किसी गलती के बिना दण्डित किए जाने में होता। यदि सदन नहीं बुलाया जाता तो निश्चित रूप से यह विधेयक पर विचार नहीं कर सकता और इस तरह का विधेयक ऊपरी सदन द्वारा उस पर विचार किया गया हुआ नहीं माना जा सकता। इसलिए ऊपरी सदन के बचाव के लिए प्रारूपण समिति ने आदि बिन्दु निश्चित किए जाने की इन दोनों सम्भावनाओं को, उदाहरणार्थ, विधेयक का पारित किया जाना तथा विधेयक का प्राप्त होना अस्वीकार कर दिया, एक प्रस्ताव जिसे उनके द्वारा प्रारूप अनुच्छेद का अंग बना दिया गया जैसा कि यह है। और उन्होंने विचार-विमर्श करके नये अनुच्छेद, जैसा कि अब प्रस्तावित है, में उन उपबन्धों को अपनाया, उदाहरणार्थ, जब विधेयक विचार के लिए रखा जाए और यदि ऊपरी सदन इस पर विचार इस धारा के द्वारा नियत की हुई विशिष्ट अवधि के अन्दर पूरा नहीं करता, तब स्पष्टतः ऊपरी सदन का मामले पर विचार करने का अधिकार उसकी अपनी गलती से चला जाता है। और कोई शिकायत नहीं कर सकता; निश्चित रूप से ऊपरी सदन शिकायत नहीं कर सकता। इसलिए मेरे माननीय मित्र पं. कुंजरू देखेंगे कि ऊपरी सदन के अधिकार कम करने के बजाय, नये प्रस्ताव ने ऊपरी सदन को कुछ अधिकार दिये हैं, जिन्हें कार्यपालिका उससे छीन नहीं सकती है।

पंडित हृदयनाथ कुंजरू : क्या यह बचकानी व्याख्या स्वयं माननीय सदस्य को संतुष्ट करती है?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यदि मेरे माननीय मित्र इसे बचकानी कहना

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चाहते हैं तो वह कह सकते हैं लेकिन मुझे कोई संदेह नहीं है कि नई धारा, जैसी कि ये पहले थी से अच्छा संशोधन है। मुझे खेद है यदि पंडित कुंजरू संतुष्ट नहीं हैं, लेकिन उन्होंने ऐसा कोई बिन्दु नहीं उठाया जिसकी कि मैंने व्याख्या नहीं की है।

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माननीय सभापति : प्रश्न है :

“कि प्रस्तावित अनुच्छेद 172 की धारा (1) के उपखण्ड (ब) में ’दो महीने’ शब्दों के लिए “तीन महीने“ शब्द प्रतिस्थापित किए जायें।“

संशोधन अपना लिया गया।

(अनुच्छेद 172, जैसा कि प्रस्तावित और संशोधित किया गया, संविधान में जोड़ दिया गया।)

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