30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(अ) उस राज्य की विधानपालिका के रूप में कार्य करने के लिए, एक निकाय,
चाहे नियुक्त, चुना हुआ या अंशतः नियुक्त और अंशतः चुना हुआ;
अथवा
(ब) जैसा कि कानून में उल्लेख हो सकता है। प्रत्येक स्थिति में इस प्रकार
के सलाहकारों या मंत्रियों की परिषद अथवा दोनों संघटन, अधिकारों
और प्रकार्यों के साथ।
(2) कोई कानून, इस अनुच्छेद की धारा (1) के संदर्भ में अनुच्छेद 304 के उद्देश्य के लिए किसी ऐसे प्रावधान को समाविष्ट करता है जो संविधान को संशोधित करता है या संविधान को संशोधित करने का प्रभाव लिए हुए है, इस संविधान का संशोधन नहीं माना जाएगा।“
महोदय, जिस मुख्य परिवर्तन को इस संशोधन द्वारा प्रभावी बनाने का प्रयत्न किया गया है वह यह है कि मूल प्रारूप में प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से किसी निकाय का गठन करने का अधिकार चाहे वह नियुक्त किया हो या चुना गया सलाहकारों या मंत्रियों की परिषद के लिए ऐसा अधिकार था जो कि राष्ट्रपति पर छोड़ दिया गया था। नया प्रारूप यह अधिकार संसद को प्रदान करता है न कि राष्ट्रपति को। केवल यही महत्वपूर्ण परिवर्तन है जिसे इस नये अनुच्छेद के द्वारा प्रभावी बनाया गया है। अन्यथा प्रावधान समान ही है।
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लाला देशबन्धु गुप्ता द्वारा प्रस्तावित संशोधन के संबंध में, मुझे निश्चित रूप से पता है कि यह वह स्थान नहीं है जहाँ संशोधन ठीक रूप में आया है। संशोधन सिद्धांत का भी प्रश्न उठाता है, उदाहरणार्थ, कि यह प्रतिनिधित्व में कुछ क्षेत्रों के महत्व की व्यवस्था करता है। अब सदन ध्यान देगा कि एक चरण में, प्रतिनिधित्व में महत्व के प्रश्न पर लम्बी बहस हुई थी और सदन ने यह सिद्धांत स्वीकार किया था कि महत्व की अनुमति नही दी जानी चाहिए। तो भी, मैं कह सकता हूँ कि अनुच्छेद 67 की वजह से जहाँ प्रतिनिधित्व के निश्चित सिद्धांत निर्धारित हैं, यह सम्भव हो सकता है कि यदि भारत के कुछ क्षेत्र शासन के तर्क से एक भी प्रतिनिधित्व पाने में अयोग्य रहे हैं तो हमें कुछ विशेष प्रावधान बनाने होंगे। हम गणितीय नियम के तर्क द्वारा किसी क्षेत्र को राज्य में प्रतिनिधित्व पाने से वंचित करने की अनुमति नहीं दे सकते। उस संबंध में इस मामले पर विचार किया जा सकता है और मैं इस चरण में कह
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, 2 अगस्त, 1949, पृ. 100-01