36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कहूँ तो मुझे ऐसा करते हुए प्रसन्न होना चाहिए और तो भी यह केवल कल किया जा सकता है।
माननीय सभापति : मैं सोचता हूँ कि श्री टी. टी. कृष्णमाचारी ने सभी बिन्दुओं पर विचार कर लिया है और आपके लिए इन बिन्दुओं का उत्तर देना आवश्यक नहीं है जो सदस्यों द्वारा उठाये गये हैं।
पं. ठाकुरदास भार्गव : हमें किसी दूसरे उत्तर की आवश्यकता नहीं है।
माननीय सभापति : यदि आप उत्तर नहीं देते तो मैं नहीं सोचता कि यह उन सदस्यों के प्रति अनादर प्रकट करता है जिन्होंने अपने विचार प्रकट किए हैं लेकिन यदि आप उत्तर देना चाहते हैं तो मैं निश्चित रूप से आपको ऐसा करने से रोक नहीं सकता। क्या आप उत्तर देने के लिए अधिक समय लेंगे?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं कुछ वक्त लूंगा। मैंने सोचा था कि किसी उत्तर की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि श्री टी.टी. कृष्णमाचारी ने उन बिन्दुओं का पहले ही उत्तर दे दिया है।
प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना : हम उन्हें कल सुनेंगे। किसी भी स्थिति में हम उन्हें सुनना चाहते हैं।
माननीय सभापति : मैं केवल समय के बारे में सोच रहा हूँ। मैं नहीं समझता कि किसी उत्तर की विशेषतया आवश्यकता है। मैं अब संशोधनों को मतदान कराने के लिए रखूंगा।
[ सभी 4 संशोधन नकार दिये गये और अनुच्छेद 276 जैसा कि डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित किया गया अपना लिया गया तथा संविधान में जोड़ दिया गया। ]
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अनुच्छेद 276
* श्री नजीरुद्दीन अहमद (पश्चिम बंगाल : मुसलमान) : क्या मैं बता सकता हूँ
| eq | lye |
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कि 3003 एक प्रारूपण संशोधन है? यह केवल कुछ शब्दों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थान्तरित करता है। माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बम्बई : जनरल) : यदि यह ऐसा है तो मैं
सहमत हूँ।
(संशोधन 3004 और 3005 प्रस्तावित नहीं किए गये।)
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 3 अगस्त, 1949, पृ. 129