अनुच्छेद 188, 277-अ, 278 और 278-अ - Page 65

44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में केवल यह उपबंधित था कि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट पर कार्रवाई करनी चाहिए। अन्यथा शब्द उसमें नहीं था। तथ्य की दृष्टि से अब यह महसूस किया गया है कि अनुच्छेद 277-क जो अनुच्छेद 278 से पहले आता है, केन्द्र पर एक कर्त्तव्य और बाध्यता अधिरोपित करता है, राष्ट्रपति की कार्रवाई को निबंधित और सीमित करना उचित नहीं होगा जो प्रांत के राज्यपाल की रिपोर्ट पर निःसंदेह कर्त्तव्य की पूर्ति में होगी। हो सकता है, राज्यपाल कोई रिपोर्ट ही न दे। फिर भी तथ्य ऐसे हैं कि राष्ट्रपति महसूस करे कि उसका हस्तक्षेप आवश्यक और सन्निकट है। मेरे विचार में, अनुच्छेद 277-क के पुरःस्थापन के फलस्वरूप आवश्यक होने के कारण हमें राष्ट्रपति को तब भी कार्रवाई करने की स्वतंत्रता देनी चाहिए जब राज्यपाल की कोई रिपोर्ट न हो और जब राष्ट्रपति की जानकारी में कुछ तथ्य आएं जिन पर उसके विचार में, उसे अपना कर्त्तव्य पूरा करने के लिए कार्रवाई अवश्य करनी चाहिए।

अनुच्छेद 278 द्वारा किया गया दूसरा परिवर्तन यह है कि मूलतः विधायिका के प्राधिकार और उसकी शक्तियों का प्रयोग केवल संसद द्वारा किया जा सकता था। अब उपबंध किया गया है कि इस प्राधिकार का प्रयोग कोई भी कर सकेगा जिसे संसद अपना प्राधिकार प्रत्यायोजित करे। प्रांतीय विधानमंडलों की, जो निलम्बित किए गए हों, विधायी शक्तियों को वस्तुतः और यथार्थतः अपने कब्जे में लेना संसद पर अत्यधिक बोझ डालना हो सकता है, क्योंकि हो सकता है संसद के पास पहले से इतना काम हो कि उसके लिए उन प्रांतों के लिए आवश्यक विधायन करना संभव न हो जिनके विधानमंडल को उद्घोषणा के द्वारा निलम्बित किया जा चुका है। अतः विधायन सुकर बनाने की खातिर अब यह उपबंध किया गया है कि संसद या तो स्वयं कर सकेगी या कतिपय शर्तों और निबंधनों एवं प्रतिबंधों के अधीन रहते हुए, विधायन का काम करने के लिए किसी अन्य प्राधिकारी को प्राधिकृत कर सकेगी।

एक अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया है। वह यह है कि उद्घोषणा दो मास बीतने पर प्रवर्तन में नहीं रहेगी जब तक कि उस अवधि के बीतने से पूर्व संसद, संकल्प द्वारा उसे आगे जारी रखना अनुमोदित न करे। मूलतः उपबंध यह था कि वह छह मास तक प्रवर्तन में रहेगी जब तक कि संसद द्वारा उसका विस्तार न किया जाये। वर्तमान प्रारूप में, वह अवधि केवल दो मास तक सीमित की गई है। इसके बाद यदि उद्घोषणा जारी रखी जानी है तो वह संसद को संकल्प द्वारा अनुसमर्थित करनी होगी।

इसमें दूसरा परिवर्तन यह किया गया है जो कि मूल अनुच्छेद में था कि यदि संसद ने एक बार उद्घोषणा को अनुसमर्थित कर दिया हो तो वह उद्घोषणा और आगे अनुसमर्थन के बिना बारह मास तक स्वतः जारी रह सकती थी। इस स्थिति को भी बदल दिया गया है। उस बारह मास की अवधि को छह मास की दो अवधियों