46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
* माननीय सभापति : मैं देखता हूँ कि अन्य अनेक वक्ता हैं और सदन पहले ही इस बहस पर पांच घंटे ले चुका है। मेरे विचार में, हमें यह चर्चा बंद कर देनी चाहिए और मैं नहीं समझता कि कोई नये तर्क पेश किए जाएंगे। यदि माननीय सदस्यों ने अब तक पेश किए गए तर्कों को सुनने के बाद अपना मन नहीं बनाया है तो कुछ और भाषण सुनने के बाद भी उनका ऐसा किया जाना संभव नहीं है। मैं यह जानना चाहूँगा कि क्या सदन चर्चा को बंद करना चाहेगा।
अनेक माननीय सदस्य : प्रश्न रखा जाए, प्रश्न रखा जाए।
माननीय सभापति : डॉ. अम्बेडकर!
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बम्बई : साधारण) : महोदय, यद्यपि इन अनुच्छेदों
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| Ec | b |
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| kèk | kj. |
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ने एक बहस को जन्म दिया है जो लगभग 5 घंटे चली है, फिर भी मैं नहीं समझता कि ऐसी कोई बात है जो बहस से निकली हो जो मुझसे यह अपेक्षा करे कि मैं इन अनुच्छेदों में समाविष्ट सिद्धांतों के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलूं। अतः मैं किसी भी प्रकार के विस्तृत उत्तर के साथ सदन को ज्यादा समय रोककर नहीं रखूंगा।
सबसे पहले मैं अपने मित्र श्री कामथ द्वारा अनुच्छेद 277-अ में सुझाए गए संशोधन पर एक मिनट चर्चा करना चाहूँगा। उनका संशोधन है कि ’और’ शब्द के स्थान पर ’अथवा’ शब्द रखा जाए। मैं नहीं समझता कि यह आवश्यक है क्योंकि ’और’ शब्द उस संदर्भ में जिसमें यह आया है, योजक और वियोजक दोनों है जिसे दोनों तरह पढ़ा जा सकता है, ’और’ या ’अथवा’ जैसा समयानुसार आवश्यक हो। अतः मैं नहीं समझता कि इस संशोधन को स्वीकार करना मेरे लिए आवश्यक है। हालांकि, मैं इस संशोधन को रखने में उनके आशय की प्रशंसा करता हूँ।
दूसरा संशोधन जिसका मैं उल्लेख करना चाहूँगा वह है जिसे मेरे मित्र प्रो. सक्सेना द्वारा पेश किया गया है। उसमें उन्होंने प्रस्ताव रखा है कि राष्ट्रपति उद्घोषणा के अधीन जो-जो बातें कर सकता है उनमें से एक है विधानमंडल को विघटित करना। मेरे विचार में, उनका संशोधन सारतः यही है। मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि यह उन बातों में से एक है जिनके लिए उपबंध किया जाना चाहिए, क्योंकि प्रांत के लोगों को विधानमंडल के निर्देश से स्थिति को ठीक करने का मौका दिया जाना चाहिए। लेकिन मैं समझता हूँ कि यह स्थिति अनुच्छेद 278 के खंड (1) के उपखंड (क) के अंतर्गत पहले ही आ चुकी है क्योंकि उपखंड (क) द्वारा प्रस्तावित है कि राष्ट्रपति राज्यपाल या शासक द्वारा प्रयोक्तव्य शक्तियों को स्वयं ग्रहण कर सकेगा। सदन का विघटन करना उन शक्तियों में से एक है जो निहित है और राज्यपाल द्वारा
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 4 अगस्त, 1949, पृ. 175