अनुच्छेद 188, 277-अ, 278 और 278-अ - Page 68

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प्रयोक्तव्य है। परिणामस्वरूप, जब राष्ट्रपति उद्घोषणा करता है और उपखंड (क) के अधीन इन शक्तियों को ग्रहण कर लेता है तो विधानमंडल को विघटित करने की और नये चुनाव कराने की शक्ति स्वतः राष्ट्रपति को अंतरित हो जाएगी। राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग अपने मंत्रियां की सलाह पर करेगा। परिणामस्वरूप, मेरा निवेदन है कि मेरे मित्र प्रो. सक्सेना द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत पहले ही उपखंड में आ गया है, वह उसमें विवक्षित है। इसलिए उस स्वरूप का कोई अभिव्यक्त उपबंध करना आवश्यक नहीं है।

अब मैं अपने मित्र पंडित कुंजरू की टिप्पणी पर आता हूँ। यदि मुझे ठीक से याद है तो उनका पहला मुद्दा था कि सांविधानिक मशीनरी ठप्प हो जाने के बाद प्रशासन अपने हाथ में लेने की शक्ति एक नई चीज है जो किसी भी संविधान में नहीं मिलती। मेरा मत कृपया उनसे भिन्न है और मैं उनका ध्यान अमरीकी संविधान के अनुच्छेद की ओर आकृष्ट करना चाहूँगा जहाँ संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का कर्त्तव्य निश्चित रूप से संविधान की गणतांत्रिक प्रणाली को कायम रखने में व्यक्त है। जब हम कहते हैं कि संविधान को संविधान के उपबंधों के अनुसार बनाये रखना चाहिए तो हमारा व्यावहारिक अभिप्राय वही है जो अमेरिकी संविधान में अभिप्रेत है और वह यह है कि इस संविधान में विहित संविधान स्वरूप को अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए। इसलिए जहाँ तक उस मुद्दे का संबंध है, हम नहीं समझते कि प्रारूपण समिति ने स्थापित सिद्धांत से कोई विचलन किया है।

आलोचना का दूसरा मुद्दा था कि अनुच्छेद 278 और 278अ इस कारण अनावश्यक है कि संविधान में पहले से अनुच्छेद 275 और 276 हैं। ससम्मान, मेरा निवेदन है कि उन्होंने (पं. कुंजरू ने) उन प्रयोजनों और आशयों को गलत समझा है जो अनुच्छेद 275 और वर्तमान अनुच्छेद 278 में अंतर्निहित है। उनका तर्क है कि आखिर आप जो चाहते हैं वह प्रांतीय विषयों पर विधायन का अधिकार है। वह अधिकार आपको अनुच्छेद 276 के अनुसार मिल जाता है क्योंकि उस अनुच्छेद के अधीन केन्द्र को, उद्घोषणा किए जाने पर, सूची II में वर्णित सब विषयों पर विधान बनाने की शक्ति मिल जाती है। मैं समझता हूँ कि यह अनुच्छेद 275 और 276 या अनुच्छेद 278 और 278-अ में अंतर्विष्ट उपबंधों की अत्यंत सीमित समझ है।

सबसे पहले मैं सदन का ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ कि वे अवसर नितांत भिन्न हैं जब अनुच्छेदों के दो सेट प्रवर्तन में आएंगे। अनुच्छेद 275 राज्य के कार्यों में केन्द्र के हस्तक्षेप को सीमित करता है, जब आंतरिक या बाह्य आक्रमण अथवा युद्ध होता है। अनुच्छेद 278 में युद्ध अथवा आक्रमण से भिन्न कारणों से मशीनरी के असफल होने का उल्लेख है जैसाकि मैंने कहा, परिणामस्वरूप