अनुच्छेद 279 - Page 71

50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस अनुच्छेद का सहारा लेंगे। इन्हीं परिस्थितियों में वे इस अनुच्छेद का सहारा लेंगे। मैं नहीं समझता कि हम यह कह सकते हैं कि इन अनुच्छेदों को व्यर्थ में अंगीकार किया गया है अथवा यह कि राष्ट्रपति ने गलत कार्य किया है।

श्री एच. वी. कामथ : क्या डॉ. अम्बेडकर सदन को यह आश्वासन देने की स्थिति में हैं कि अनुच्छेद 143 का अब उपयुक्त ढंग से संशोधन किया जाएगा?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैंने ऐसा कहा है और मैं अब कहता हूँ कि जब प्रारूपण समिति द्वितीय वाचन के पश्चात् बैठक करेगी तो वह सम्पूर्ण अनुच्छेद 143 के उपबंधों पर विचार करेगी और यदि आवश्यक हुआ तो अनुच्छेद 143 का उपयुक्त ढंग से संशोधन किया जाएगा।

माननीय सभापति : अब मैं एक-एक करके संशोधन मतदान के लिए रखूंगा।

प्रश्न है :

“कि अनुच्छेद 188 विलुप्त किया जाए।“

प्रस्ताव अंगीकृत हुआ।

अनुच्छेद 188 संविधान से हटा दिया गया।

अनुच्छेद 279

* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : सभापति महोदय, मैं समझता हूँ केवल दो मुद्दे उठाये गये हैं। उनका उत्तर दिया जाना है। मेरे मित्र प्रो. सक्सेना ने जो मुद्दा उठाया है वह यह है कि आपातकाल में मूल अधिकारों में संशोधन संसद द्वारा किया जाना चाहिए, न कि राज्य द्वारा। यदि मेरे मित्र अनुच्छेद 13 के उपबंधों का हवाला देगें तो उन्हें स्वयं पता चल जाएगा कि हमने कोई भी परिवर्तन करने के लिए जो मूल अधिकारों पर प्रभाव डालें, केन्द्र और प्रांत दोनों को अनुज्ञात किया है, बशर्ते कि उनके द्वारा किए गए परिवर्तन युक्तियुक्त हों। इसलिए सामान्य परिस्थितियों में, मूल अधिकारों पर प्रभाव डालने वाली विधियां बनाने का प्राधिकारी दोनों में निहित है और कोई कारण नहीं है कि उदाहरण के लिए इस सामान्य अधिकार को जो राज्य के पास है, आपातकाल में क्यों छीना जाए।

प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना : लेकिन वे आपातकाल में निलम्बित हो जाएंगे।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : निलम्बन एक दूसरे अनुच्छेद में आते है। इस

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 4 अगस्त, 1949, पृ. 185