56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अनुच्छेद 251
* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं विनम्रतापूर्वक प्रस्तावित करता हूँ :
“कि अनुच्छेद 251 के खंड (2) में ’भारत के राजस्व’ शब्दों के स्थान पर ’भारत की संचित निधि’ शब्द रखे जाएँ।
** माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, अब मैं इस बात को स्पष्ट कर सकता हूँ। ऐसा करने से पहले मैं दूसरे संशोधन लेता हूँ।
एक संशोधन श्री बर्मन का है और दूसरा संशोधन प्रो. सक्सेना का है। मुझे अफसोस है कि मैं किसी भी संशोधन को स्वीकार नहीं कर सकता।
यह प्रश्न कि क्या आयकर द्वारा संगृहीत राजस्व का प्रतिशत संविधान में ही या तो 60 प्रतिशत विहित कर दिया जाना चाहिए अथवा राष्ट्रपति के विनिश्चय के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए। ऐसा मामला है जिसपर केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों दोनों के द्वारा सम्मेलन में, जो इस विषय पर चर्चा करने के लिए दूसरे दिन बुलाया गया था, गहन विचार-विमर्श किया जा चुका है। यह सहमति हुई थी कि सर्वोत्तम यही होगा कि इस विषय पर राष्ट्रपति स्वयं विहित करें तथा संविधान में कोई अनुपात नियत नहीं किया जाना चाहिए।
दूसरा प्रश्न प्रो. सक्सेना द्वारा उठाया गया है। वह यह है कि ’विहित’ शब्द के बजाय ’संसद द्वारा विहित’ शब्द रखे जाएं। मुझे पुनः अफसोस है कि मैं इस संशोधन को स्वीकार नहीं कर सकता। हमारी योजना है कि सबसे पहले राष्ट्रपति को स्वयं अनुपात विहित करने दें और दूसरी बार में वित्त आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात्। हम संसद को बीच में नहीं लाना चाहते। क्योंकि उस स्थिति में, विभिन्न प्रांतों के प्रतिनिधियों के बीच बहुत खींचातानी होगी और इस तथ्य के कारण घोर अन्याय हो सकता है कि कुछ प्रांतों के संसद में बहुत ज्यादा सदस्य हों और कुछ प्रांतों के कम प्रतिनिधि हों। परिणामस्वरूप, मामले को संसद के ऊपर छोड़ने से व्यावहारिक दृष्टि से अभिप्रेत होगा कि उसे उन प्रांतों के मतों पर छोड़ देना जिनके पास केन्द्र में ज्यादा प्रतिनिधि हैं और इससे मेरे विचार में, न्याय पर कुठाराघात हो जाएगा जो आप विभिन्न प्रांतों के साथ करना चाहते हैं।
अब महोदय, उस कठिनाई पर आते हैं जो आपने उठाई हैं, “वे राज्य जिनके
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 4 अगस्त, 1949, पृ. 111
** वही, पृ. 221-23