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भीतर वह कर उस वर्ष में उद्ग्रहणीय है“ शब्द आवश्यक हैं। ये शब्द भारत शासन अधिनियम, 1935 में आए हैं। ये शब्द तब क्यों समाविष्ट किए गए थे। इसका कारण यह था कि आयकर का उद्ग्रहण देशी रियासतों में नहीं किया जाना था जो भारतीय संघ में मिलने वाली थीं। आयकर के बदले, देशी रियासतों से अपेक्षित रहता था कि वे कुछ अंशदान करें, इसलिए यदि कर, उस रियासत में नहीं लगाया जाता तो वह रियासत हिस्से के लिए हकदार न होती। हम नहीं जानते कि वर्तमान संविधान के अधीन क्या प्रक्रिया होने वाली है। इस विषय पर एक समिति द्वारा विचार किया जा रहा है जो देशी रियासतों के वित्त के बारे में अन्वेषण करने के लिए नियुक्त की गई हैं। यदि उस समिति की सिफारिश है कि आयकर सभी रियासतों में लगाया जाना चाहिए चाहे वे मूलतः भारतीय प्रांत या देशी रियासतें थीं तो स्वभावतः इन शब्दों को बदलना होगा। इस अनुच्छेद को प्रस्तावित करते समय मैं प्रारूपण समिति को यह स्वतंत्रता देना चाहता हूॅ कि जब इस बाबत उस समिति की रिपोर्ट हमारे समक्ष आए तो वह कुछ संशोधनों पर सुझाव दें। इसी कारण ये शब्द यहाँ हैं।
माननीय सभापति : अब एक और बात। क्या मैं यह समझूं कि इसका आशय उन मामलों को उसके भीतर लेने का नहीं है जिसे ब्रिटिश भारत कहा जाता था?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : नहीं, नहीं, भाग 3 की रियासतें।
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श्री बी. दास : डॉ. अम्बेडकर ने प्रांतों के प्रधानमंत्रियों और प्रारूपण समिति के सम्मेलन के फैसलों का हवाला दिया है। इस सदन को जानकारी नहीं है कि उनके बीच क्या हुआ तथा उनके विचार-विमर्श का परिणाम क्या है। जब तक उन विचार-विमर्शों का कार्यवृत्त सदन के पटल पर एक टिप्पणी के रूप में था अन्यथा न रखा जाए तब तक हम प्रारूपण समिति की कार्रवाई के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की स्थिति में नहीं हैं।
माननीय सभापति : मैं समझता हूँ, यदि प्रांतों के किसी भी प्रधानमंत्री ने कोई भी प्रश्न उठाया होता तो वे प्रश्न उठाने के लिए यहाँ होते यदि वे प्रारूप से सहमत नहीं थे। अतः मैं मानता हूँ कि सदन के समक्ष प्रस्तुत प्रारूप पर प्रधानमंत्रियों की सहमति या सम्मति है।
श्री बी. दास : यह सदन उससे आबद्ध नहीं है जो कुछ प्रधानमंत्रियों और वित्त मंत्रियों ने इस सदन के बाहर किया है। यदि कोई फैसला किया गया तो उन दस्तावेजों की प्रतिलिपियां प्राप्त करना इस सदन का विशेषाधिकार एवं परमाधिकार है।
माननीय सभापति : प्रधानमंत्रियों और प्रारूपण समिति के किसी भी फैसले से यहाँ कोई भी आबद्ध नहीं हैं। यह सदन अपनी मर्जी से अपना मत देने के लिए स्वतंत्र है।