अनुच्छेद 253 - Page 81

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मेरा प्रस्ताव है कि अनुच्छेद 253 के

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खंड (2) में “भारत के राजस्व“ शब्दों के स्थान पर “भारत की संचित निधि“ शब्द रखे जाएं।

माननीय सभापति : इसके बाद संशोधन सं. 214 जो श्री महावीर त्यागी के नाम में है।

श्री महावीर त्यागी : महोदय, मेरा प्रस्ताव है :

“कि संशोधनों की सूची के संशोधन सं. 2886 के संदर्भ में, अनुच्छेद 253 का

खंड (1) हटा दिया किया जाए।“

* * * * *

* माननीय सभापति : डॉ. अम्बेडकर, आप कुछ कहना चाहते हैं?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं श्री त्यागी द्वारा पेश किए गए संशोधन को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ, और मेरे विचार में यह आवश्यक है कि मैं प्रारूपण समिति की ओर से कुछ स्पष्टीकरण दूं कि उसने इस संशोधन को स्वीकार करना क्यों प्रस्तावित किया है?

मुख्य मुद्दों पर आने से पहले, जो संशोधन की स्वीकृति को न्यायोचित ठहराते हैं, मैं आलोचना के उस बिंदु का जवाब देना चाहूँगा जो मेरे मित्र प्रो. सक्सेना द्वारा प्रारूपण समिति के विरुद्ध उठाया गया है।

प्रो. सक्सेना ने कहा कि प्रारूपण समिति के लिए अनुच्छेद में मूलतः खंड (1) को रखना उचित नहीं था और अब श्री त्यागी द्वारा प्रस्तावित संशोधन को स्वीकार करने के लिए तैयार होना चाहिए। मैं कहना चाहता हूँ कि खंड (1) जो प्रारूपण समिति ने रखा था, प्रारूपण समिति के अपने विचार-विमर्श से उत्पन्न नहीं हुआ था। यदि मुझे ठीक से याद है तो वह खंड संघीय शक्ति समिति की रिपोर्ट में सुझाया गया था। उसमें फैसला लिया गया था कि नमक शुल्क नहीं लगाया जाना चाहिए। चूंकि प्रारूपण समिति संघीय शक्ति समिति की रिपोर्ट के निर्देशों एवं सिद्धांतों से आबद्ध थी इसलिए उसके पास उस सुझाव को संबंधित अनुच्छेद में शामिल करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था। इसलिए प्रारूपण समिति की ओर से वास्तव में दुविधा का कोई सवाल नहीं है।

अब मैं उन व्यावहारिक कठिनाइयों पर आता हूँ जो इस ख्ांड को रखने पर आ सकती हैं। स्मरण रहे कि सूची 1 में दो प्रतिष्टियां हैं- प्रविष्टि 86 जो केन्द्रीय

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 5 अगस्त, 1949, पृ. 238-39