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(2) इस प्रकार की विहित राशियां भारत की संचित निधि पर भारित बनी रहेंगी जब तक जूट और जूट उत्पादों पर भारत सरकार निर्यात शुल्क उदगृहीत करती रहती है। या दस वर्ष की अवधि के समाप्त होने तक - इन दोनों में से जो भी पहले हो।
(3) इस अनुच्छेद में, ’विहित’ पद का वही अर्थ है जो इस संविधान के अनुच्छेद 251 में है।“
महोदय, इस संशोधन के द्वारा जूट और जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क में हिस्सा बांटने की वर्तमान प्रणाली में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया है। भारत सरकार अधिनियम में उपबंध था कि कतिपय प्रांत जो इस अनुच्छेद में वर्णित हैं, जूट और जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क के आगम में कतिपय शेयर के इस कारण हकदार होने चाहिए कि इस अनुच्छेद में वर्णित प्रांतों की अर्थव्यवस्था में जूट एक अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तु है। संशोधित अनुच्छेद में प्रस्ताव के द्वारा जूट और जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क में हिस्सा मांगने का कुछ प्रांतों का यह अधिकार समाप्त हो जाएगा। इसका कारण बहुत सरल है यदि मैं ऐसा कह सकता हूँ। साधारणतया समस्त निर्यात और आयात शुल्क केन्द्रीय सरकार के हैं और किसी भी प्रांत को किसी खास वस्तु पर जो उस विशिष्ट प्रांत की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण वस्तु है उदगृहीत निर्यात शुल्क में हिस्से का हक नहीं है। फिर भी, इस तथ्य की दृष्टि से कि विशेषकर बंगाल के वित्त को निर्यात शुल्क में हिस्से के बिना संतुलित नहीं रखा जा सकता, भारत सरकार अधिनियम, 1935 में एक अपवाद किया गया था जिसके द्वारा बंगाल सरकार और अन्य सरकारों को निर्यात शुल्क में हिस्से का दावा करने का निहित अधिकार दिया गया है। जैसाकि मैं कह चुका हूँ यह इस व्यापक सिद्धांत के विपरीत है कि निर्यात और आयात शुल्क केन्द्र सरकार के होते हैं। अब यह महसूस किया गया है कि भारत सरकार अधिनियम, 1935 में किए गए इस अपवाद को आगे जारी नहीं रखा जाना चाहिए। ऐसा क्यों महसूस किया गया कि इस द्वेषपूर्ण सिद्धांत को तुरन्त हटा दिया जाए इसका कारण है कि यह कल्पना करना पूर्णतः संभव है कि दूसरे प्रांत भी, जिनके पास अपने क्षेत्रों में उगी कुछ वस्तुएँ हैं और जो अपने क्षेत्र के बाहर उसका निर्यात करते हैं, जिस पर भारत सरकार निर्यात शुल्क लेती है, उन उत्पादों पर निर्यात शुल्क में हिस्सा मांग सकते हैं। यदि यह प्रवृति बढ़ी तो भारत सरकार के लिए बहुत मुश्किल स्थिति पैदा हो जाएगी। परिणामस्वरूप फैसला किया गया कि इस सिद्धांत को निश्चित रूप से निराकृत कर दिया जाए। लेकिन यह भी बराबर साफ हैं कि यदि निर्यात शुल्क में हिस्सा मांगने के सिद्धांत को अचानक वापस ले लिया गया तो इससे अनेक प्रांतों के बजटों का संतुलन डगमगा जाएगा