64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जो अब तक निर्यात शुल्क में एक हिस्से पर निर्भर करते थे। अतः एक उपबंध किया गया कि निर्यात शुल्क में विनिर्दिष्ट तौर पर एक हिस्सा देने के बजाय एक समतुल्य राशि या एसी राशि जो राष्ट्रपति द्वारा तय की जाए, उस अवधि में जिसमें निर्यात शुल्क उद्गृहीत होता रहेगा या जब तक कि दस वर्ष नहीं बीत जाते इनमें से जो भी पहले हो, उन प्रांतों को दे दिया जाए या सौंप दिया जाय। पश्चात् कथित इसलिए समाविष्ट किया गया था ताकि उन प्रातों को अपने संसाधन विकसित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके और वे, इस अनुच्छेद में वर्णित अवधि के पश्चात् अपने बजट को संतुलित रखने की स्थिति में हो सकें।
आशा है, श्रीमान, यह आज्ञापक उपबंध, जो इस संशोधित अनुच्छेद 254 में लेखबद्ध है, सदन को स्वीकार्य होगा।
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* माननीय डॉ. भीमराव अम्बेडकर (बम्बई : साधारण) : माननीय सभापति महोदय,
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बहस के उत्तर में मैं उन दर्दभरी दास्तानों का जिक्र करना नहीं चाहता जो विभिन्न प्रांतों के सदस्यों द्वारा इस सदन में सुनाई गई हैं। वे यह महसूस करते हैं कि उनके साथ राजस्व के वितरण में बुरा बर्ताव किया गया है, जैसाकि भारत सरकार अधिनियम 1935 के अधीन आदिष्ट किया गया है। इसका जवाब देने के लिए मैं कुछ अन्य ठोस मुद्दों को लेना चाहता हूँ।
सर्वप्रथम, मैं अपने मित्र प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना द्वारा रखे गए संशोधन के बारे में कुछ शब्द बोलना चाहता हूँ। वे चाहते हैं कि अनुदान, राट्रपति द्वारा नियत किए जाने के बजाय, संसद द्वारा नियत किए जाने चाहिए। अब, पिछली बार अन्य वित्तीय अनुच्छेदों पर बहस के दौरान, मैंने कहा था कि वितरण के मामले में संसद को लाने का आशय नहीं था, क्योंकि हम नहीं चाहते कि राजस्व का वितरण या तो विभिन्न प्रांतों के बीच द्वन्द्व की या विभिन्न प्रांतों के प्रतिनिधियों के बीच हाथापाई की विषय-वस्तु बने। मैं चाहता हूँ इस विषय पर राष्ट्रपति द्वारा अथवा वित्त आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा फैसला किया जाए। यही वजह है कि मैं प्रो. सक्सेना के संशोधन को स्वीकार करने को तैयार नहीं हूँ।
अब मैं अपने मित्र श्री मैत्रा द्वारा उठाए गए मुद्दे पर आता हूँ। उनका पहला तर्क था कि उन्हें कोई कारण दिखाई नहीं पड़ता कि प्रारूपण समिति अब संशोधन लाकर मूल अनुच्छेद में परिवर्तन करे। मुझे विश्वास है, वे वित्त पर विशेषज्ञ समिति
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 8 अगस्त, 1949, पृ. 259-61