66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय सभापति : संभवतः आप 251 की बात कर रहे हैं?
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माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : खेद है। मुझे ठीक कर दिया गया। वह
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अनुच्छेद 251 है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जहाँ तक आबंटन विहित किए जाने का संबंध है, प्रारूपण समिति ने ’विहित’ शब्द की दो भिन्न परिभाषाएँ सुझाई है। विहित शब्द की पहली परिभाषा के अनुसार जब राष्ट्रपति के समक्ष वित्त आयोग की रिपोर्ट न हो तब राष्ट्रपति द्वारा विहित किया जाता है। विहित शब्द की दूसरी परिभाषा से तब विहित किया जाता है जब राष्ट्रपति के समक्ष वित्त आयोग की सिफारिशें हों। प्रारूपण समिति को ’विहित’ शब्द के निर्वचन की दो भिन्न परिभाषाएं देनी पड़ी हैं, इसका कारण नितांत स्पष्ट है कि प्रांत चाहते हैं कि वर्तमान आवंटन केवल जूट शुल्क का ही नहीं बल्कि संविधान के अन्य अनुच्छेदों में उपबंधित राजस्व के अन्य स्रोतों का आवंटन भी वैसा नहीं होना चाहिए जैसाकि अब विद्यमान, है, क्योंकि उनकी शिकायत है कि अब उन्हें दी गई धनराशियाँ न तो पर्याप्त हैं और न ही न्यायसंगत हैं, और यह कि आवंटन का कुछ पुनरीक्षण आवश्यक है। प्रकटतः यदि आवंटन तुरन्त किया जाना है तो नया आवंटन संविधान के प्रारंभ होने पर प्रारंभ होगा, यह स्पष्ट हैं कि ऐसा आवंटन केवल राष्ट्रपति, द्वारा वित्त आयोग की सिफारिशों की प्रतीक्षा किए बिना किया जा सकता है क्योंकि यह सोच के भी परे है कि केन्द्र सरकार चाहे कितनी भी जल्दी करे, यह संभव नहीं होगा कि वह एक आयोग नियुक्त करे और संविधान प्रारंभ होने से पूर्व उसकी रिपोर्ट प्राप्त हो जाए। परिणामस्वरूप, हमें ’विहित’ शब्द की दोहरी परिभाषा की युक्ति खोजनी पड़ी। प्रथमतः ‘‘विहित’’ राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग की सिफारिशों के बिना किया जाएगा। निःसंदेह इसका यह अभिप्राय नहीं है कि राष्ट्रपति मनमाने ढंग से कार्रवाई करेगा। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि राष्ट्रपति केवल मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्रवाई करेगा, जो केन्द्र बनाम प्रांतों की स्थिति को रक्षित और सुरक्षित करने में हितबद्ध हो। मेरे विचार में यह बात केन्द्र सरकार के ध्यान में है। और मुझे इस बात को बिल्कुल साफ कर देना चाहिए कि केन्द्र सरकार का प्रस्ताव है कि एक समिति नियुक्त की जाए जो विशेषज्ञ समिति होगी या कोई विशेषज्ञ अधिकारी होगा जो निःसंदेह संविधान के अर्थ में आयोग नहीं होगा, जो प्रश्न पर विचार करके यह ज्ञात करे कि क्या वर्तमान आवंटन केवल जूट और जूट उत्पाद पर शुल्क ही नहीं बल्कि राजस्व के अन्य स्रोतों के अन्य आवंटन भी इस प्रकार पुनरीक्षित किए जाने अपेक्षित हैं कि प्रांत-प्रांत के बीच और केन्द्र-प्रांत के बीच न्याय हो सके। परिणामस्वरूप, जब राष्ट्रपति का पहला आदेश जारी होगा तो वह जैसाकि मैंने कहा है, मनमाना नहीं होगा अथवा केंन्द्र की कार्यपालिका की सलाह मात्र पर नहीं होगा बल्कि उनके पास एक स्वतंत्र, एक विशेषज्ञ राय होगी जिससे उन्हें मार्गदर्शन मिलेगा। उसके बाद जब आदेश के