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पुनरीक्षण का आगे सवाल पैदा होगा तो यह सवाल पैदा होगा कि क्या राष्ट्रपति को संसद की सलाह पर कार्य करना चाहिए अथवा उन्हें स्वयं अपनी सलाह पर कार्य करना चाहिए अथवा उन्हें वित्त आयोग की सिफारिश और सलाह पर कार्य करना चाहिए। जिसे संविधान के अधीन नियुक्त किया जाएगा। जैसाकि मैंने कहा है, हमारे सामने तीन अनुकल्प थे जिन्हें हम अपना सकते थे। मैं जानता हूँ, मेरे माननीय मित्र पंडित कुंजरू सर्वोत्तम उद्देश्य युक्त सुझाव देते हैं कि राष्ट्रपति को स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए न कि वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार। एक वर्ग इस मत का है जिसका प्रतिनिधित्व मेरे माननीय मित्र प्रो. सक्सेना कर रहे हैं, कि राष्ट्रपति को वित्त आयोग की सिफारिंश पर भी कोई आवंटन नहीं करना चाहिए जब तक उसको संसद मंजूरी न दे दे। जैसाकि मैं कह चुका हूँ, इन दोनों स्थितियां दोषपूर्ण हैं। मैं नहीं समझता कि आवंटन की सिफारिश करने के लिए आयोग नियुक्त किए जाने के बाद राष्ट्रपति के लिए यह ठीक रहेगा कि वह उस आयोग की सिफारिशों को न मानें, अपने दृष्टिकोण पर चलें और आवंटन करें। मेरे विचार में, वह आयोग के प्रति असम्मान दिखाना होगा। जैसाकि मैंने कहा, मामला संसद पर छोड़ने का तीसरा अनुकल्प मुझे खतरानाक प्रतीत होता है, उससे प्रांतीय विवाद पैदा होंगे और प्रांतीय ईर्ष्या उत्पन्न होगी। इसलिए मैं कह सकता हूँ, प्रारूपण समिति ने बीच का रास्ता अपनाया है और वह यह है कि यद्यपि मामले पर संसद में बहस हो सकती है, फिर भी राष्ट्रपति द्वारा की गई कार्रवाई वे वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिश से मार्गदर्शित होनी चाहिए और उन्हें मनमाने ढंग से कार्य नहीं करना चाहिए। आशा है सदन इसे स्वीकार कर लेगा। ये तीन पद्धतियों का सर्वाधिक युक्तियुक्त सामंजस्य है। अतः इस मामले से निपटने का यही सर्वोत्तम ढंग है।
[ पहले वर्णित डा. अम्बेडकर का संशोधन अंगीकृत हुआ ]
अनुच्छेद 254 संविधान में जोड़ा गया।
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